कहानी : अमरफल


सरहद का साक्षी @कहानीकार : कवि सोमवारी लाल सकलानी निशांत।

जेठ के महीने की झुलसा देने वाली गर्मी थी। आसमान पर कहीं भी बादल का एक टुकड़ा भी नहीं दिखाई दे रहा था। आकाश आग उगल रहा था। दिन प्रतिदिन सूखी गर्मी में बढ़ती जा रही थी। चैत -बैसाख में जंगल में आग लगने के कारण जल स्रोतों का पानी भी सूख गया था। दूरदराज की घाटियों में दरियायों में बहुत कम पानी रह गया था । जिनके पास घोड़े खच्चर थे, वह अपने घोड़े खच्चरों पर पानी ले आते थे बाकी अन्य लोगों को मीलों पैदल चलकर भी एक पीपे पानी के लिए तरसना पड़ता था। क्षेत्र के अधिकांश लोग कृषक होने के नाते बरसाती पानी पर ही निर्भर रहते थे।
कई दिनों से लोग मां भगवती से मन्नत मांग रहे थे कि बारिश हो जाए और उनके खेतों के रोपाई हो सके ताकि सर्दियों के लिए अनाज मिल सके। घराटो के लिए पानी होगा, जंगल में हरियाली छा जाने के कारण मवेशियों को चारा भी उपलब्ध हो जाएगा तथा जिंदगी में रंगत लौट के आ जाएगी। कुछ लोग जड़धारियों की जात का इंतजार कर रहे थे कि कब उनका ढोल मां के मंदिर पहुंचे,नौबत बजे और वारिश हो। अमूमन निश्चित तिथि को ही यह मुहूर्त पड़ता था या जब मां भगवती की आज्ञा होती थी। जात के तीसरे दिन बारिश होती थी चाहे काम हो या अधिक। आस्था कभी मरती नहीं थी।
हंसराज गरीब किसान था। खेती के लिए बहुत कम जमीन थी। जोत भी बिखरी हुई और दूर-दूर तक थी । पैतृक संपत्ति थी इसलिए खेतों को बंजर भी नहीं छोड़ा जा सकता था। अथक परिश्रम करके मुश्किल से तीन महीने का गेहूं खाने के लिए प्राप्त होता था। बाकी जो कुछ आमद होती थी वह चतुर्मास में डांडों / छानियों की खेती पर निर्भर थी। खेती-बाड़ी के बावजूद मेहनत मजदूरी करके हंसराज परिवार का लालन पालन करता था ।यद्यपि छोटा परिवार था फिर भी “छोटी पूजा तो पांच भांडे और बड़ी पूजा तो पांच भांडे” वाली बात थी। हंसराज भाग्यवादी व्यक्ति था, इसलिए पुरुषार्थ पर कम और भाग्य पर ज्यादा भरोसा करता था या बेचारा परिस्थितियों का मारा था।
हंसराज का 15 साल का एक बेटा था जो बहुत मेहनती था। इस इसलिए कुछ लोग उसकी कर्मठता को देखकर जलते भी थे लेकिन हंसा बहुत खुश रहती थी कि उसका बेटा बहुत मेहनती है और किसी न किसी तरह जिम्मेदारियां आने पर अपना पेट दो भर लेगा। दुर्लभता के उस युग में अक्सर लोग मेहनत ज्यादा करते थे और प्रकृति रूठने के बाद में कुछ न कुछ पेट भरने को दे ही देती थी।

चैत और बैसाख के महीने सबसे भुखमरी के होते थे।बैसाख मे तो थोड़ा बहुत जौ हो भी जाए थे लेकिन गाय – भैंस के पिंडा (पौष्टिक पोषण ) के लिए साल भर पुगाने पड़ते थे। कुछ भून कर और कुछ सत्तू बनाकर भी पेट भरने के काम आते थे।बहराल जौ की रोटी और पुदीना की चटनी मुख्य आहार था।
इस वर्ष हंसराज के खेतों में गेहूं की फसल अच्छी हुई। हंसा बहुत प्रसन्न थी कि पेट भरने के लिए तीन महीने के लिए भोजन प्राप्त तो हो गया है। बाकी मां भगवती की कृपा हो ही जाएगी।उसे पूरा विश्वास था।
“बेटा गोपी सुबह जल्दी उठना। आटा खत्म हो गया है। कल घराट से आटा पीस कर लाना है ।जंगल के नीचे तक मैं तुम्हारे साथ चलूंगी ताकि तुम्हें डर ना लगे ।आजकल पानी की कमी है। जब सबसे पहले घराट पहुंचेगा ,तभी दिन तक आटा पीस पाएगा। फिर वक्त पर तुम्हें छान में वापस भी तो लौटना है। मैंने तुम्हारे लिए हम तो रोटी बना कर अभी रख ली है।” प्यार से गोपी का सिर सहलाते हुए हंसा ने कहा। “ठीक है मां”। ” अरे ! तेरी मति मारी गई है, जंगल का रास्ता है,सुबह जायेगा तो कहीं बाघ – रीख खा जायेगा। गेहूं भिगो दे। दो चार दिन गेंहवाता ( गेहूं की खिचड़ी) से ही काम चल जाएगा”। हंसराज ने खरेंड (बड़ा चूल्हा) के कोने से कड़क कर कहा। हंसा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की और चुपचाप सभी लोग सो गए।
गोपी सुबह 4:00 बजे जागा । हाथ मुंह धुल कर, दो बासी रोटी खाई और भीमल की राश्शि पर गेहूं की थैली पीठ पर बांधकर गोधूलि में ही घराट की तरफ चला गया। सात मील पैदल चलना था। तंदुरुस्त बालक था। कुलांचे मारता हुआ जंगल के रास्ते से दो घंटे में घराट पहुंच गया। उस दिन आटा पीसने वालों की संख्या बहुत कम थी और गोपी ने सबसे पहले अपनी बारी लगा दी। जब तक भगवाला आया (घराट का मालिक) गोपी ने थैली का गेहूं
रियूड मे डाल दिया था। दो घंटे में गोपी का आटा पीस गया।दुर्भाग्य से उस दिन घराट मालकिन की तबीयत ठीक नहीं थी बरना मानव धर्म के नाते वह दूर के घटवालों ( अनाज पिसवाने वाले )को एक दो रोटी तथा साथ मे हरे धनियां -लहसून के पत्तों की चटनी देती थी।यह उसका धर्म था।
गोपी ने आटे की थैली रस्सी में बांधकर पीठ पर लगाई और छानी (मौसमी डेरा)की ओर बढ़ा। 07 मील की खड़ी चढ़ाई चढ़ने को थी।सुबह की खाई हुई दो बासी रोटियां कब की पच चुकी थी। गोपी के पेट में चूहे दौड़ने लगे। लेकिन लाचार था। जब छान में पहुंचेगा तभी मां कुछ खाने के लिए देगी और तभी पेट भर सकता है । इसलिए अपने मनोबल को बनाए हुए वह आगे बढ़ता रहा । उतराई में जितनी दूरी दो घंटे में तय होती है, चढ़ाई में उतनी दूरी को तय करने के लिए चार घंटे का समय चाहिए बिना रुके हुए गोपी चलता गया।
भूख और थक के कारण गोपी चूर चूर हो गया। आधा दूरी तय करने के बाद उसमें आटे की थैली एक पत्थर के ऊपर रख कर गोपी कुछ विश्राम करने के लिए बैठ गया अभी आधा रास्ता भी तय नहीं हुआ था और चढ़ाई भी बढ़ती जा रही थी।दोपहर की गर्मी और जला रही थी। अभी रास्ते मे कहीं पेड़ की छाया भी नहीं थी।नंगी धार थी। बुशर्ट के बाजू से पसीना पोछने लगा। लेकिन किस्मत को कोसने का अभी उसे ज्ञान ने था। नहीं ईश्वर से शिकायत का वक्त।
गोपी ऊंचे पहाड़ों की तरफ एकटक लगाए हुए देख रहा था। क्षितिज पर कहीं भी बादल का टुकड़ा नहीं दिखाई दे रहा था। “अभी 3 मील की दूरी तय करने के लिए है। बीच में जंगल है इसलिए गर्मी से इतना ज्यादा नहीं झुलसना पड़ेगा।” उसने मन में सोचा।
अचानक उसका ध्यान मां भगवती के मंदिर की ओर गया ।उसके मन में मां की मूरत आने से अद्भुत प्रसन्नता का भाव जगा। अपनी भावनाओं में खोया हुआ गोपी काफी देर तक सोचता रहा। भूख से वो छटपटा रहा था ।अचानक उसका ध्यान सूखी घास के बीच में गया और उसे फल के आकृति का कुछ दिखाई दिया। आटे की थैली को मेड पर टिका कर वह उस जगह पर गया। उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। एक बहुत बड़ा फल है। आड़ू का फल घास के बीच में एक छोटी सी टहनी के बीच में मुस्कुरा रहा था तत्परता से गोपी ने आड़ू निकाला और बिना किसी सोच-विचार के उसे खा लिया ।
“वाह! वाह ! क्या “अमर फल” खा लिया ! अब तो तीन मील क्या पांच मील भी पैदल चल सकता हूं।बीस किलो की जगह तीस किलो आटा ले जा सकता हूं ! शरीर में एक अजीबोगरीब ताकत उत्पन्न हो गई।
इसे एक दैवीय चमत्कार कहें या ईश्वरीय वरदान । गोपी को कुछ समझ नहीं सका । जब उसने यह बात अपने साथियों को बताई तो उनके आश्चर्य का भी ठिकाना ना रहा।
समय बदलता गया। गोपी घर -गृहस्थी वाला एक उम्रदराज व्यक्ति बन गया ।धन-संपत्ति भी मेहनत के बल पर प्राप्त की। लेकिन ईश्वरय आस्था में कमी होने लगी । उसे जब अमरफल का जब स्मरण होता है ,तो अब दिल के स्थान पर वह दिमाग से काम करने लग गया । सोचने लगा कि हो सकता है, कभी वहां पर आडू का बड़ा पेड़ रहा हो और उसके जड़ से जुड़ा हुआ तने में कोई डंठल आ गया हो तथा उस पर आड़ू का फूल फल आ गया हो ,जो कि घास के बीच में छुपा हुआ रहा और उसे प्राप्त हो गया। यह सब उसकी संपन्नता या बौद्धिक प्रमाद या अहंकार का कारण था।
कुदरती भाव की कमी उसे आजभी महसूस होती है लेकिन वह केवल कठिनाइयों के समय ही। हां ! इतना जरूरी है कि समय-समय पर जब गोपी को अपना पुरातन याद करता है और अनेकों चमत्कार प्रकृति के सानिध्य में उसके सामने जो आए तो फिर उसकी आस्था लौट कर आ जाती है । एक सुखद अनुभूति का एहसास आज भी उसे होता है और फिर उसका मन प्रकृति की क्रोड़ में बसे दिव्य स्थल की ओर चला जाता है, जिसके दर्शनों को करने के लिए लोग लाखों रुपए खर्च करके, गर्मी के दिनों में ,सैर सपाटा और तीर्थाटन को लाखों लोग आते हैं।
गोपी की भावना अमर है और उसकी आस्था का भाव उसके जीवन भर रहेगा । चाहे वह साधारण आडू का दाना रहा हो या “अमरफल” रहा हो। जो अनायास, असमय, आम रास्ते मे उसे मिला और पेट की ज्वाला शांत करते हुए उसे असीम शक्ति प्रदान कर गया। आज बाजार से खरीद कर दो किलो बिलायती आड़ू लाया हूं। खूब खाए भी। स्वाद भी उत्तम है। मिठास भी है लेकिन ये अमरफल नहीं हो सकते हैं यह केवल फल हैं।मौसमी,बेमौसमी,संकर , हाईब्रिड फल। वह अकेला फल था जो देवताओं को भी दुर्लभ रहा होगा किंतु मां भगवती ने वह मुझे प्रदान किया। जो वह गरीब बच्चों को समय समय पर प्रदान करती है।

पता – 
सुमन कॉलोनी चंबा टिहरी गढ़वाल।
उत्तराखंड (भारत)।

Print Friendly, PDF & Email
Share