कविता: पथिक अकेला

हरेला लोकपर्व की सार्थकता: एक सामूहिक उत्तरदायित्व

 सरहद का साक्षी @कवि:सोमवारी लाल सकलानी, निशांत 

चलो, चलें !
संसार बसाने फिर एक बार।
टूटी – श्रृंखलाओं को जोड़ने,
बिखरे मोतियों को समेटने,
खुली हवा में सांस लेने के लिए,
बंद दरवाजों को खोलने के लिए।

सवा वर्ष से विद्यालयों में ताले !
कोरोना से पड़ गए जीवन के लाले !
पथिक अकेला – सड़क पर,
ढूंढ रहा है पुरातन की परछाई ।
शून्य को निहारता – बेचैन व्यग्र ,
शिशु दर्शन -दुर्लभ चहल -पहल ।

ग्रीष्मावकाश का- अंतिम दिवस!
सुबह तेज धूप, दुपहरी में बादल।
संध्या समय- स्वच्छ नीलांबर।
पहाड़ों की ग्रीष्म – शीत पवन !
बांज -बुरांश के सदाबहार वन,
खींच ले जा रहें- अंनत की ओर।

मन अतीत की स्मृति में निमग्न ,
खोज रहा है स्व अस्तित्व असीम।
बच्चे, शिक्षक विकल, चैतन्य,उदास,
जीवन की स्वर्ण किरण लिए निशांत।
पथिक अकेला पतझड़ की सायं,
अलसाई आंखें ढूंढ रही दिग छोर।v

स्वप्निल आंखों में चमकते ख्वाब
टूटते जीवन के नित भ्रम जाल।
कालचक्र के बंधन में बंधे इंसान,
मृग मरीचिका के मधु उपहास ।
बेचैन व्यग्र मन को आया ख्याल
अंतिम पारी खेलने को बेताब !

चलो चलें ,
संसार बसाने फिर एक बार,
थोड़ी सी शक्ति दे दे भगवान।
हो जाय इस कोरोना की मुक्ति,
समझ पाऊं तेरी असीम शक्ति ,
संसार फिर से हो सके गुलजार।

कवि कुटीर, सुमन कॉलोनी चंबा, टिहरी गढ़वाल

Print Friendly, PDF & Email
Share