कविता: यह जख्म बुरा है – यह घाव बड़ा है…!

कविता: यह जख्म बुरा है - यह घाव बड़ा है...!

प्रकृति पर जख्म

सरहद का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत,

यह जख्म बुरा है, यह घाव बड़ा है,
काली करतूतों से – मनुष्य मरा है !
यह कोई कुदरत का कहर नहीं है,
मानव के दुष्कर्मों का प्रतिफल है।
यह जख्म बुरा है,यह घाव बड़ा है …

यह खतरनाक पशुओं ने किया है!
एक सुरम्य पहाड़ को तोड़ दिया है।
चांदी कागज के टुकड़ों की खातिर,
दौलत की हवस ने अपराध किया है।
यह जख्म बुरा है,यह घाव बड़ा है …

अभी देखना यह घाव,नासूर बनेगा !
पर्वत के वक्ष से अब लावा उगलेगा।
मिट जायेगा अस्तित्व सुंदर शहर का,
जब जग जायेंगे गबर सुमन निंद्रा से।
यह जख्म बुरा है,यह घाव बड़ा है …

डर सत्ता दौतल के आगे नतमस्तक हैं !
नारद, इंद्र, इंद्राणी लंबेकुर्ते वाले चुप हैं।
पत्थर पड़ रहें हैं सिर पर तमाशबीन हैं !
पत्थर खाने के लिए सज्जन तरस रहें हैं।
यह जख्म बुरा है,यह घाव बड़ा है …

केवल चलानों के बल शासन नही चलेगा,
चुप रहने से कभी देश आजाद नही होगा।
अब अंदर की ज्वाला को बाहर निकालो ,
एक बार अमर कुंवर प्रसून को जगा दो।
यह जख्म बुरा है,यह घाव बड़ा है …

देवभूमि के स्वरूप का अब हाल बुरा है !
खंड -भंड पर्वत पहाड़ सब दरक रहा है।
यह कुदरत का कहर नहीं,ना है जनहित,
दौलतमंद यहां पर साध रहे अपना हित।
यह जख्म बुरा है,यह घाव बड़ा है …

* कवि निशांत निवास, सुमन कॉलोनी चंबा,टिहरी गढ़वाल।

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