कविता: मेरे घर के चित्र कैलेंडर्स !

कविता: मेरे घर के चित्र कैलेंडर्स

कैलेंडर्स

सरहद का साक्षी

@सोमवारी लाल सकलानी, निशांत

न देवी – देवता, न हीरो – हिरोइन,
न स्वर्ग -नरक के चित्र।
बस केवल पुस्तक आखर बच्चे,
सदा मेरे घर के मित्र ।

मेरे घर में मेहमान सदा ही,
मेज आलमारियों में बैठे हैं।
फुरसत जरूरत बाहर आते,
कुछ चैन से भी बैठे रहते हैं।

मेरे घर के चित्र कैलेंडर्स ,
रूप बदलते रहते हैं।
देशकाल परिस्थितियों की,
रमणीयता घर भरते हैं।

परिवर्तन की इस दुनिया में,
कुछ नयापन भी भरते हैं।
देह बदलते, रंग – रूप भी,
पर फीके वे नहीं पड़ते हैं।

मेरे घर के चित्र कैलेंडर्स,
अमर आखर बनते हैं।
बच्चों की खुशियां ज्ञान संग,
खालीपन भी भरते हैं।

कवि कुटीर, सुमन कॉलोनी चम्बा, टिहरी गढ़वाल
Print Friendly, PDF & Email
Share