कविता: देख रही है प्रिय धरा निरंतर!

कविता: देख रही है प्रिय धरा निरंतर

Ghughuti, घुघुति

सरहद का साक्षी @ कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत,

फाख्ता गौरैया ग्लैडोलिया,
गेंदा गुड़हल गुलदाऊदी।
हरित क्षेत्र सम्मुख सुरपर्वत,
पुष्प पर्ण सुरभित मही।

मेरे घर आंगन में हर दम,
खगकुल स्वच्छ समीर बही,
सूर्य रश्मियां तिरछी किरणें,
धरती दूषित है नहीं कहीं।

सघन वन बांज व काफल,
श्री देव सुमन विद्यालय।
प्रतिपल प्रतिध्वनि खाल से,
गुंजारित है यह आलय।

सूरज सम्मुख, हेंवल घाटी,
जड़धार हरित – हिमालय।
सर- सर बहती मंद पवन,
लगती ज्यों यह मलयालय।

दिन में सूरज -रात चंद्रमा,
विघुत बाती -पथ प्रकाश।
देख रही है प्रियधरा निरंतर,
जीवन की लय,सतत प्रवाह।

*सुमन कॉलोनी चंबा, टिहरी गढ़वाल

Print Friendly, PDF & Email
Share