कविता: सुरभित सुमन, कांटे ना शूल,  बाहर है वन, भीतर फूल…!

सरहद का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत

सुरभित सुमन, कांटे ना शूल,

बाहर है वन, भीतर फूल…!

खिलती कालियां, कहीं न धूल।
शोणित पुष्प, हरित हैं पर्ण-
मृगछौना खड़े किए ज्यों कर्ण।
बाहर है वन, भीतर फूल —
सुरभित सुमन, कांटे ना शूल,
कुदरत को यहां नहीं है भूल।
शीतल पवन कहें कुछ कूल –
क्षेत्र ज्ञान जलस्रोतों का मूल।
बाहर है वन, भीतर फूल —
यह ज्ञान निकेतन बहती गूल –
कायदे कानून इंग्लिश रूल।
विभिन्न उपकरण साधन टूल –
लेकिन नहीं है, स्वीमिंग पूल।
बाहर है वन, भीतर फूल —
यह पर्वत जंगल फबता खूब –
कभी नहीं मन को होवे चूभ।
देवभूमि है, जन कहें ना झूठ,
वीर भूमि यह,सेना भर्ती छूट।
बाहर है वन, भीतर फूल
राजनीति है – नही रचना कूट,
हाथ हथरखा -हल हाथी शूंट।
हाथ हथेली जब हो पैसा मूठ,
पीता पर्वत सोम रस की घूंट।
बाहर है वन, भीतर फूल –
क्षेत्र यह सुसभ्यताओं का झूल,
घाटी अवस्थित सुमन का जूल।
आकृति पहाड़ ज्यूं शिव त्रिशूल,
यहां न उपहास ना होती है हूल।
बाहर है वन, भीतर फूल ।।

💥यह तुकांत कविता कवि श्री निशांत जी द्वारा  बच्चों की सृजनात्मकता शक्ति को बढ़ाने हेतु रची गई है।

Print Friendly, PDF & Email
Share