कविता: घोर तिमिर-नभ घन नाद मनोहर

कविता: घोर तिमिर-नभ घन नाद मनोहर
सरहद का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी निशांत

सजल जलज घन मेघ प्रिय बदरा,
आच्छादित व्योम अंबर घन परदा।
पर्वत क्षितिज नभ धरती मां एका,
प्रफुल्लित ज्यूं मयूर मन यह मेरा।

छिपे वन द्रुम धार खाल घन बिच,
स्वर सृजन गतिमान सकल जग।
वर्षा ऋतु है यह आहट जग प्यारी,
धरा विचित्र बहु रंग चित्रमय न्यारी।

गगन इड़ा सम न क्षितिज आकाशा,
दुर्लभ संयोग कहीं न भानु प्रकाशा।
तरल तन घन बरसात मानसून प्यारा,
प्रतिपल बारीस तन लगे नहीं जाड़ा।

माह आषाढ़ सुर सुरभित जल धारा,
चहल पहल जग -जीवन नहीं कारा।
मई जून रवि प्रचंड रूप चढ़ता पारा,
आए मानसून घन, सरिता -रस धारा।

कृषि कर्म निरंतर खेत क्षेत्र सुशोभित,
कृषक हृदय हर्षित मन – तन मोदित।
आंगन फाख्ता – कबूतर गुटुर-गू गाए,
सजल मानसून घन अच्छे दिन लाए।

घोर तिमिर नभ- घन -नाद – मनोहर।
कांवड़ चले हिम जल भरकर हर हर।
फसलपात पशुधन जग यह अदभुत,
छाए बादल जब अंबर बरसे जमकर।

*सुमन कॉलोनी चंबा, टिहरी गढ़वाल।

Print Friendly, PDF & Email
Share