कविता: ऑडिट बहुत खतरनाक है उसका

कविता: ऑडिट बहुत खतरनाक है उसका

सरहद का साक्षी @कवि : सोमवारी लाल सकलानी, निशांत

गरीब के खून के पैसे से जश्न न मनाओ !
गरीब के पसीना चूस कर दुर्ग न बनाओ!
गरीब की मजदूरी पर डाका नहीं डालो !
और गरीब की कमाई का लुफ्त न उठाओ !

मजदूर के खून – पसीने से होली न खेलो !
कृषक कमाई से दलालों महल न बनाओ !
नौकरों की मेहनत पर टैक्स मत लगाओ!
और हर शहर में कोठियां महल न बनाओ !

गरीब का खून सूखता है,तो कयामत आती है।
धरती का सीना फटकर गहरीगर्त बन जाती है।
भूकंप के झटकों से,धरती- रूह कांप जाती है,
और खून चूसने वालों, सुनो कयामत आती है !

धन- दौलत,सत्ता मद, झटके में छूट जाता है।
रसूखदारों को पानी देने वाला, नहीं आता है।
जानवरों की तरह जीवन जीने वालों की सुनो !
खतरनाक जानवरों संभलो! समझो और गुनो !

नशा उतर जाता है, उत्तरार्ध जब दौड़ा आता है।
किए गए गुनाहों के लिए – वह दंड देने आता है।
मजदूर और मजबूर के लहू का ब्यौरा मांगता है।
और शोहरत का हिसाब वह बराबर कर देता है !

उसका ऑडिट बहुत खतरनाक है, सरमायदारों !
वह पाई- पाई हिसाब रजिस्टर करना जानता है !
पेट भरने वाले, पेट काटने वाले, सभी कांपते हैं।
उसकी कलम शाश्वत अमिट स्याही से लिखती है।

फैसला तुम्हे करना है, हमने तो आगाह किया है !
याद दिलाना कवि फर्ज है, सब्जबाग न दिखाया है।
बाकी तुम्हारी मर्जी है ! हमने तो मार्ग सुझाया है।
उसकी मर्जी का अहसास पुन: तुम्हें करवाया है।

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