यूं ही हर कोई नहीं बन सकता- बड़ा नेता

यूं ही हर कोई नहीं बन सकता- बड़ा नेता

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत

का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी,निशांत, 
स्रोत : हमारे नायक (विजेंद्र रावत)

पुस्तक- कुछ वर्ष पूर्व चंबा में स्थित अपने एक प्रतिष्ठित सामुदायिक रेडियो की वर्षगांठ के अवसर पर प्रख्यात पत्रकार श्री विजेंद्र रावत ने एक पुस्तक भेंट की। पुस्तक का शीर्षक था” हमारे नायक।” उत्तराखंड की महान विभूतियों के बारे में इस पुस्तक में लिखा गया है। आम आदमी से लेकर खास व्यक्ति तक, राजा से लेकर रंक तक; प्रख्यात पत्रकार ने शोध के आधार पर इस पुस्तक का निर्माण किया है।

पुस्तक पढ़ी – फुर्सत के क्षणों में कई बार यह पुस्तक पढ़ी। आज मन में आया कि जब किसी की सत्ता होती है तो लोग उसी की प्रशस्ति करते हैं। गुण गान करते हैं क्योंकि एक ऐसा वातावरण देश में पैदा हो चुका है और सामाजिकता पार्श्व में चली गई है। सबके अपने स्वार्थ हैं और बिना राजनीतिक संरक्षण के स्वार्थों की पूर्ति नहीं हो सकती है।

एक नायक – श्री विजेंद्र राजपूत ने अपनी पुस्तक में एक महान व्यक्तित्व का जिक्र किया जिनका नाम है श्री हरीश रावत माननीय पूर्व मुख्यमंत्री,उत्तराखंड। मैंने उनके बारे में पढ़ा तो काफी कुछ समाज सेवा और स्वच्छता के प्रति उनके किए गए कार्यों के लिए श्रद्धा से सिर झुक गया। श्री विजेंद्र राजपूत जी ने अपनी पुस्तक में लिखा कि प्रदेश के मुखिया ने गांव में जूठे पत्तल उठाने से समाजसेवा शुरू की। जनसेवा का सफर किया।

आज उन्हीं के लेख के स्रोत पर आधारित अंश। हर एक नहीं बन सकता है, बड़ा नेता।

जीवन परिचय – श्री हरीश रावत जी हमारे उत्तराखंड में बहुत ही साधारण परिवार में जन्मे व्यक्ति थे। उनका बाल्यकाल काफी कठिनाइयों में गुजरा। पिताजी की शीघ्र ही मृत्यु हो चुकी थी। और माताजी भी गंभीर बीमारी से ग्रसित थी। माता-पिता की जिम्मेदारी का भार, दो छोटे भाइयों की पढ़ाई लिखाई उनके जीवन यापन का भार, श्री हरीश रावत जी के कंधों पर आ गया। दो जून रोटी के जुगाड़ के लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी। “होनहार बिरवान के होत चिकने पात” यह कहावत श्री हरीश रावत जी पर अक्षरक्ष: सही है।

शिक्षा – लखनऊ विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई शुरू की लेकिन पढ़ाई पूरी न हो पाई और वह अपने गांव लौट आए ।लखनऊ में पढ़ाई के दौरान वह इंदिरा गांधी से प्रभावित हुए। उन्होंने इंदिरा जी को अपने विद्यालय में भी बुलाया था । गांव के जूनियर हाई स्कूल में उनकी पढ़ाई हुई। एक जनप्रतिनिधि के द्वारा उन्होंने उस विद्यालय को सरकारी मान्यता प्रदान की।

समाज सेवा की शुरुआत – उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत बेहद दिलचस्प ढंग से शुरू की सर्वप्रथम उन्होंने अपने गांव में शादी -विवाह या अन्य धार्मिक या सामाजिक अनुष्ठानों में भोजन के पास पड़ी हुई जूठी पत्तलों को उठाने, बाद मे सफाई की व्यवस्था करना या झाड़ू लगाना, ऐसा कार्य उन्होंने किया। अपने घर और गांव के रास्तों की नियमित सफाई की ।जिससे उनकी लोकप्रियता बढ़ गई और धीरे-धीरे हरीश रावत का नाम क्षेत्र में जाना जाने लगा।

तन्मयता – हरीश रावत जी के गांव लौटने पर गांव के लोगों ने भी उनकी खूब प्रशंसा की और उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ स्कूल के भवन का निर्माण किया। खुद कंधों पर पत्थर ढोए। उनकी उम्र के बच्चे जब शादी ब्याह में जश्न और समारोह में हुड़दंग में मशगूल रहते थे, तो ऐसे समय में हरीश रावत तन्मयता से समाज सेवा का कार्य करते थे।

ग्राम प्रधान से ब्लॉक प्रमुख – ग्राम पंचायत के जब चुनाव हुए तो गांव वालों ने एक व्यक्ति को निर्विरोध ग्राम प्रधान चुन लिया। वह अशिक्षित थे। इसके गांव की बैठक मैं गांव वालों के साथ उन्होंने शर्त रखी थी वह प्रधान तभी बनेंगे ,जब उप प्रधान का पद हरीश संभालेगा। उनका कहना था कि यह पढ़ा लिखा व्यक्ति है और कागज पत्र भी संभाल लेगा । ग्रामीणों ने स्वीकार किया। प्रधान और उपप्रधान जब ब्लॉक प्रमुख का टिकट लेने के लिए मुख्यालय भकियासैन गए । ब्लाक प्रमुख के टिकट भी दिए जा रहे थे। प्रमुख पद की दौड़ में कांग्रेसी,जनसंघ के दो बड़े स्थानीय नेता दौड़ में थे। हरीश के साथ नाथू सिंह प्रधान और कई लोग थे। तभी प्रमुख पद की एक कद्दावर प्रत्याशी ने व्यंग्यात्मक लहजे में हरीश रावत पर व्यंग किया कि उपप्रधान के साथ प्रमुख का पर्चा भी भरोगे क्या ?

नाथू सिंह का योगदान – यही बात नाथू सिंह को चुभ गई और हरीश से कह दिया कि हां वह प्रमुख का पर्चा भरेंगे। नाथू सिंह ने अपनी जेब से पैसे निकाले और कहा प्रमुख का पर्चा भी भरें और देखते-देखते उन्होंने पचरा भरा और प्रमुख भी बन गए। उस समय उनकी उम्र 21 साल की थी और हरीश की दावेदारी को लोगों ने गंभीरता से नहीं लिया। पर्चों की जांच के समय किसी ने भी उनकी कम उम्र की दावेदारी का मुद्दा नहीं उठाया और वह चुनाव मैदान में आ गए दोनों पार्टियों के प्रत्याशियों ने जमकर पैसा बहाया लेकिन हरीश के साथियों ने प्रधान के साथ मिलकर अपनी योजना साफ कर दी थी और वह ब्लॉक प्रमुख बने।
धीरे-धीरे हरीश रावत ने छोटे-छोटे कार्य करके गांव का मान बढ़ाया। आसपास के प्रधान उनसे जुड़ने लगे और इसके बाद हरीश रावत एक सच्चे जनप्रतिनिधि के रूप में उभर कर जनता के सम्मुख आ गए। युवा कांग्रेस अल्मोड़ा के अध्यक्ष बने।

सांसद से राज्यमंत्री – अल्मोड़ा पिथौरागढ़ लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी कद्दावर नेता भाजपा के डॉ मुरली मनोहर जोशी को साठ हजार मतों से हराया । बस ! यही से हरीश रावत एक बड़े नेता के रूप में उभर के आ गए। पांच बार सांसद रहे। कांग्रेस सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। विभिन्न ट्रेड यूनियनों के राष्ट्रीय नेता रहे। प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल संसदीय कार्य मंत्री, जल संसाधन मंत्री,रोजगार और श्रम राज्यमंत्री के रूप में उन्होंने काम किया।

सातवें मुख्यमंत्री ,उत्तराखंड – 2000 में उत्तराखंड कांग्रेस के अध्यक्ष बने और फरवरी 2014 में उत्तराखंड के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने शपथ ली।

सिंहासन फूलों की सेज नहीं – श्री हरीश रावत सिंहासन को कभी फूलों की सेज नहीं माना उसे कांटो के ताज के रूप में स्वीकार किया । उन्होंने अपना अधिकांश समय जनहित और जन सेवा में समर्पित कर दिया। वह आम आदमी से लेकर बड़े लोगों तक उनकी पहुंच गई।जो भी कार्य उन्होंने किए वह जमीनी स्तर पर किए और अनेकों बार उन्हें कई प्रकार के षड्यंत्रों का भी सामना करना पड़ा लेकिन हरीश रावत ने बखूबी सफलता प्राप्त की। वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के साथ-साथ केंद्र सरकार में श्रम राज्यमंत्री के रूप में भी रहे और अनेक पदों पर उन्होंने जनप्रतिनिधि के रूप में कार्य किया।

कुछ अन्य पहलू – 1977 में आपातकाल के समय जब अधिकांश कांग्रेसी हार कर बैठ गए या पाला बदल दिया तो हरीश रावत तन्मयता के साथ अपने मिशन पर लगे रहे और हरीश रावत के कार्यों की गूंज दिल्ली दरबार तक पहुंची और वह कांग्रेस के विश्वास पात्र बड़े नेता के रूप में शुमार हो गए। एक जन नेता के रूप में हरीश रावत हमेशा लोकप्रिय रहे हैं। राजनीति में तो उनका बड़ा कद है ही। हर समय अपने लोगों की मदद करने के लिए तैयार रहते हैं।

ठेठ पहाड़ी – उन्होंने कभी पहाड़ को नहीं छोड़ा और अपने कार्यकाल में अनेकों बड़े कार्य उन्होंने किए । एम्स अस्पताल की स्थापना की। हरीश रावत उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने तो उसके बाद दिल्ली जाते वक्त हवाई जहाज में दुर्घटना बस उनकी गर्दन की हड्डी जख्मी हो गई और जिसके कारण उन्हें काफी समय तक परेशानियों का सामना करना पड़ा। लेकिन ईश्वर की मंशा थी वह ठीक हो गए और अपने कार्य को उन्होंने बखूबी अंजाम दिया। कुछ समय के पश्चात हरीश रावत के विरुद्ध पार्टी में बगावत हो गई लेकिन हरीश रावत ने अपने राजनीतिक सूझबूझ के द्वारा समस्या का निदान किया और अपना मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा किया।

लेख सामाजिकता और स्वच्छता के लिए प्रेरक – श्री हरीश रावत जी से मेरा कोई राजनीतिक संबंध नहीं है । उनकी विचारधारा अलग है और मेरी विचारधारा अलग है । लेकिन एक साहित्यकार होने के नाते, एक सामाजिक व्यक्ति होने के नाते, नगर पालिका परिषद चंबा का स्वच्छता ब्रांड एम्बेसडर होने के नाते, उनकी समाज सेवा, स्वच्छता की पहल को मैं नमन करता हूं। प्रणाम करता हूं जो कि हमारे उत्तराखंड की नहीं बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए प्रेरणास्पद है। आज भी चाहे कुछ भी हो, एनडी तिवारी जी के बाद श्री हरीश रावत पहाड़ में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता के रूप में हैं। भले ही वह सत्ता में हों या ना हों लेकिन कांग्रेसी नहीं बल्कि देश के बड़े राजनेताओं में वह शुमार किए जाते हैं। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह शतायु हों और समाज की सेवा करते रहें।

पहल को प्रणाम – एक छोटी सी उम्र में ही सामाज का कार्य करने के लिए और स्वच्छता की पहल करने के लिए हरीश रावत जी को नमन। धन्यवाद।

(स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर)
नगर पालिका परिषद चंबा ,टेहरी गढ़वाल ।
उत्तराखंड।

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