डायरी के अंश: मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि मैं पहाड़ में पैदा हुआ

गरीबी ने बहुत कुछ सिखाया और बहुत कुछ दिया भी

सरहद का साक्षी @ कवि : सोमवारी लाल सकलानी,निशांत

मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि मैं पहाड़ में पैदा हुआ। पहाड़ में रहा और पहाड़ में रहता हूं ।अपने जीवन का एक तिहाई हिस्सा मां सुरकंडा के चरणों में समर्पित किया। प्रकृति के सानिध्य में रहकर बहुत कुछ सीखा। हर दिन मौसम, जलवायु मैंने मेरे लिए खुली किताब की तरह रहे। जितना इन्हें पढता रहा , उतना अनुभव होता गया।

गरीबी से पाला पड़ा, लेकिन गरीबी ने बहुत कुछ सिखाया और बहुत कुछ दिया भी। जीवन का एक तिहाई हिस्सा राजकीय सेवा में गुजरा। वह भी स्वर्णिम काल था। बच्चों को पढ़ाया। बच्चों से बहुत कुछ सीखा। साथियों के सानिध्य में रहकर संसार का अनुभव हुआ ।बाकी एक तिहाई हिस्सा शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और समाज के उन्नयन के लिए समर्पित है।

अर्जित ज्ञान और अनुभव समाज में प्रस्तुत करता रहूंगा

अर्जित ज्ञान और प्राप्त अनुभव के द्वारा जितना जीवन में कुछ बन पाएगा, उसे अपने मस्तिष्क के परकोटे में ही संचित नहीं रखूंगा, बल्कि जितना अधिक से अधिक हो सकेगा उसे समाज के सामने प्रस्तुत करता रहूंगा। चाहे पुस्तकों के माध्यम से हो, चाहे आलेख, कविता, कहानी, समालोचना, संस्मरण, यात्रा विवरण या गूढ़ साहित्य के रूप में हो।

समाज की एक छोटी सी इकाई के रूप में जब तक मेरी ज्ञान इंद्रियां कार्य करेंगी, हमेशा ही सेवारत रहने का स्वप्न देखता रहूंगा। जीवन के अंतिम दस वर्ष कि अभी कोई योजना नहीं है क्योंकि तब तक आंख -कान पूर्ण रूप से धोखा दे जाएंगे, लेकिन फिर भी पर्वत के परकोटे पर बैठकर सर्दी ,गर्मी, वर्षा, बर्फ का अनुभव और आभास करता रहूंगा और बिना आंख, कान के भी पर्वत के परकोटे पर बैठकर उस सर्दी, गर्मी , वर्षा , बर्फ का आभार जरूर करूंगा। अर्जित ज्ञान और प्राप्त अनुभवों को आने वाली पीढ़ी के लिए परोसता रहूंगा।

प्रकृति का रम्य और उद्दीपन रूप सदा जीवन का अंग रहा है । लौकिक संसार में भी बहुत कुछ सीखा ,लेकिन अफसोस इस बात का है कि बासठ साल तक कोई भी अंतरंग साथी और शत्रु नहीं मिला। पूरे संसार को अपने चश्मे से देखा । हमेशा ही आनंद की अनुभूति प्राप्त करता रहा। कभी मानसिक अठखेलियां खेली।कभी कल्पना के पंखों के साथ उड़ा । कभी जीवन को एक रहस्य के रूप में माना ,लेकिन हमेशा ही आनंद का भाव रहा । जीवन में नीरसता कभी नहीं आई ।
प्रौढ़ावस्था प्राप्त होने पर सौभाग्य से फिर घर पर नन्हे शिशुओं, बच्चों का सानिध्य प्राप्त हुआ। स्कूली बच्चे अब साथ नहीं है, जिन्हें कभी पढ़ाया करता था। उनके साथ खेला करता था । गिले-शिकवे होते थे ।बिफरना और रूठना बना हुआ रहता था। ठीक वही हालात आज घर में है। घर के अलावा पास- पड़ोस के बच्चों को भी उसी अंदाज में व्यवहार करता हूं और सुख की अनुभूति प्राप्त करता हूं।

स्वयं हम जब बच्चे थे तो किसी भी आगंतुक के गांव में आने पर अत्यंत प्रसन्नता होती थी । उनके चेहरे की तरह ताकते रहते थे कि कहीं कोई लेमनचूस, टॉफी , चना, लाइचिदाना दे जाए या कोई मूंगफली का दाना या पताशा दे दे। जब कोई मेहमान गांव में आता था तो दीवाली जैसे रंगत मन के अंदर आती थी। बस ! वही बात आज भी मन मे है। वह अनुभव भी काम आया।

सेवानिवृत्ति के बाद जो कार्य पहले नहीं कर सका, उसे अब कर रहा हूं। बाजार जाता हूं तो दोनों जेबों को भरकर विभिन्न प्रकार की चीजें, जो आज बाजार में उपलब्ध हैं, लॉलीपॉप -कुरकुरे -चिप्स- फ्रूटी- जूस आदि ले आता हूं। कभी-कभी यह सामग्री घर नहीं पहुंच पाती है । रास्ते में ही अनेकों बच्चे चरण स्पर्श करते हुए , कोई मुख पर ताकते हुए मिल जाते हैं और सामग्री होने पर वितरित हो जाती है। परम सुख की प्राप्ति होती है।

अपने घर, डांडे -कांठे, खेत -खलियान, वन पर्वत, गधेरों, वनस्पति, खेती – बाड़ी ,बड़े बुजर्गों से सदा स्नेह रहा है। इन सब के बिना जिंदगी अधूरी है।बच्चों के साथ जितना आनंद है उतना अन्यत्र दुर्लभ है। साक्षात प्रभु के दर्शन होते हैं।

जंगल का आदमी हूं , इसलिए रास्ते में लंगूर और बंदर बिल्ली , कुत्ते आदि को मिल जाते हैं और उनकी रूचि के अनुसार कभी-कभी उन्हें भी उनका अंश भेंट कर देता हूं। मूंगफली का एक दाना प्राप्त कर लंगूर और बंदर भी मित्र बन गए। पहले घूरते थे अब नहीं। कुत्ते दुम हिलाते हैं। बिल्ली ताकती है और चिड़ियों का कलरव सुनता हूं। दिन के तीन बार दरवाजे पर दस्तक देती है। उनके लिए भी चावल दाना और पानी की व्यवस्था की है। कुल मिलाकर जिंदगी एक सौभाग्य है। यह सौभाग्य सदैव बना रहे।

हम प्राणी मात्र के लिए जितना कुछ कर सके, वह करें और निष्ठा और ईमानदारी के साथ अपना जीवन जिएं, इसी में सबसे बड़ी उपलब्धि महसूस होती है और यही सबसे बड़ी दौलत है। कोई भी बुराई अच्छाई लेकर आती है। कष्ट तो महाराजा हरिश्चंद, सावित्री आदि ने भी झेले लेकिन पांच हजार वर्ष पूर्व से नाम उन्ही का आता है। आज भी हम उनके कार्यों और आदर्शों पर कमोबेश चलते हैं और उनका स्मरण, अनुकरण करते हैं। पूजा करते हैं।भावना से बढ़कर कोई भगवान नहीं , सद विचार से बढ़कर कोई सिद्धांत नही और सत्कर्मों से बढ़कर कोई तीर्थ नही। आनंद से बढ़कर कोई स्वर्ग नहीं।

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