बाल कविता: हम शिशु हैं जी…! 

बाल कविता: हम शिशु हैं जी...! 
सरहद का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत,

योग दिवस पर ही नहीं,
हम नियमित योग करते हैं।
जीवन के सुखद भविष्य के लिए,
योग व्यायाम हम करते हैं।

हम कुर्सी, बेड, चटाई ,सोफों को,
सब लांघ जाते हैं।
खेल खेल में ब्रश से ,
कुछ रंग रोगन भी कर जाते हैं।

हम शिशु हैं जी,
हमें न पीटें डांटे और नहीं फटकारें।
हां ! हमारी देखभाल ,
सौ काम छोड़ कर, आप कीजिए।

थोड़ा समय निकाल कर,
हमारे साथ योग कीजिए !
सुखद क्षणों स्वस्थ जीवन के लिए,
हमारे साथ खेलें योग कीजिए।

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