कहानी: कोरोना को किसने हराया?

समझें कि कितना प्राचीन है हमारा ये हिन्दूधर्म? शाश्वत सनातन धर्म विषयक विज्ञ होकर भी धर्मान्तरण कितना उचित?

सरहद का साक्षी @हर्षमणि बहुगुणा,
मैं *एक प्रायवेट कम्पनी में बाबू* हूँ हमेशा की तरह कम्पनी में काम कर रहा था। मुझे हल्का बुखार आया शाम तक सर्दी भी हो गई पास ही के मेडिकल स्टोर से दवाइया मंगा कर खाई।
3-4 दिन थोड़ा ठीक रहा एक दिन अचानक साँस लेने में दिक्कत हुई औक्सिजन लेवल कम होने लगा मेरी पत्नी तत्काल रिक्शा कर मुझे अस्पताल लेकर पहुंची।

सरकारी अस्पताल में पलंग फुल चल रहे थे, मैं देख रहा था मेरी पत्नी मेरे इलाज के लिये डाक्टर के सामने गिड़गिड़ा रही थी। अपने परिवार को असहाय सा बस देख ही पा रहा था मेरी तकलीफ बढ़ती जा रही थी मेरी पत्नी मुझे हौंसला दिला रही थी कह रही थी, – *कुछ नहीं होगा हिम्मत रखो*, ( *यह वही औरत थी जिसे मैं हमेशा कहता था की तुम बेवकूफ औरत हो तुम्हें क्या पता दुनिया में क्या चल रहा है*)।
उसने एक प्राइवेट अस्पताल में लड़ झगड़ कर मुझे भर्ती करवाया। फिर अपने भाई याने मेरे साले को फोन लगाकर सारी बातें बताई उसकी उम्र होगी 20 साल के करीबन *जो मेरी नजर में आवारा और निठल्ला था जिसे मेरे घर आने की परमीशन नहीं थी*।

वह अक्सर मेरी गैर हाजरी में ही मेरे घर आता जाता था। फिर, अपने देवर को याने मेरे छोटे भाई को फोन लगा कर उसने बुलाया जो मेरे साले की उम्र का ही था *जो बेरोजगार था और मैं उसे कहता था “काम का ना काज का दुश्मन अनाज का”* दोनों घबराते हुए अस्पताल पहुंचे दोनों की आंखों मे आंसू थे दोनों कह रहे थे की आप घबराना मत आपको हम कुछ नहीं होने देंगे।
डॉक्टर साहब कह रहे थे की हम 3-4 घन्टे ही औक्सिजन दे पायेंगे फिर आपको ही औक्सिजन के सिलेंडर की व्यवस्था करनी होगी। मेरी पत्नी बोली डाक्टर साहब ये सब हम कहां से लायेंगे।
तभी मेरे भाई और साला बोले हम लायेंगे सिलेंडर आप इलाज शुरु कीजिये दोनों वहां से रवाना हो गये। मुझ पर बेहोशी छाने लगी और जब होश आया तो *मेरे पास औक्सिजन सिलेंडर रखा था*।

मैंने पत्नी से पूछा ये कहां से आया उसने कहा *तुम्हारा भाई और मेरा भाई दोनों लेकर आये हैं।* मेंने पूछा कहां से लाये , उसने कहा ये तो वो ही जानें।
अचानक मेरा ध्यान पत्नी की खाली कलाइयों पर गया मैंने कहा तुम्हारे कंगन कहां गये? कितने साल से लड़ रही थी कंगन दिलवाओ कंगन दिलवाओ अभी पिछ्ले महीने शादी की सालगिरह पर दिलवाये थे ( *बोनस मिला था उस समय*)। वह बोली आप चुपचाप सो जाइये कंगन यहीं हैं, कहीं नहीं गये मुझे उसने दवाइयां दी और मैं आराम करने लगा, नींद आ गई।
जैसे ही नींद खुली क्या देखता हूं *मेरी पत्नी कई किलो वजनी सिलेंडर को उठा कर ले जा रही थी जो थोड़ा सा भी वजनी सामान उठाना होता था तो मुझे आवाज देती थी* आज कैसे कई किलो वजनी सिलेंडर तीसरी मंजिल से नीचे ले जा रही थी और नीचे से भरा हुआ सिलेंडर ऊपर ला रही थी। मुझे गुस्सा आया मेरे साले और मेरे भाई पर ,ये दोनों कहा मर गये फिर सोचा आयेंगे तब फटकारुंगा।
फिर पड़ोस के बेड पर भी एक सज्जन भर्ती थे उनसे बातें करने लगा मैंने कहा की अच्छा अस्पताल है नीचे सिलेंडर आसानी से मिल रहे हैंं।

उन्होंने कहा क्या खाक अच्छा अस्पताल है ? यंहा से 40 किलोमिटर दूर बड़े शहर मे 7-8 घन्टें लाइन में लगने के बाद बड़ी मुश्किल से एक सिलेंडर मिल पा रहा है। आज ही अस्पताल मे औक्सिजन की कमी से 17 मौतें हुई हैं। मैं सुनकर घबरा गया और सोचने लगा की शायद मेरा साला और भाई भी ऐसे ही सिलेंडर ला रहे होंगे पहली बार दोनों के प्रति सम्मान का भाव जागा था ।

कुछ सोचता इससे पहले पत्नी बड़ा सा खाने का टिफ़िन लेकर आती दिखी, पास आकर बोली उठो खाना खा लो। उसने मुझे खाना दिया एक कोर खाते ही मैने कहा ये तो माँ ने बनाया है, उसने कहा हां माँ ने ही बनाया है। माँ कब आई गांव से, उसने कहा कल रात को। अरे वो कैसे आ गई, अकेले तो वो कभी नहीं आई शहर। पत्नी बोली बस से उतर कर आटो वाले को घर का पता जो एक पर्चे मे लिखा था वह दिखा कर घर पहुंच गई।
मेरी माँने शायद बाबूजी के स्वर्गवास के बाद पहली बार ही अकेले सफर किया होगा। गांव की जमीन मां बेचने नहीं दे रही थी तो मेरा मेरी माँ से मन मुटाव चल रहा था कहती थी मेरे मरने के बाद जैसा लगे वैसा, करना जीते जी तो नहीं बेचने दूंगी।
पत्नी बोली मुझे भी अभी मेरी मां ने बताया की आपकी माँ रात को आ गई थी, वो ही घर से खाना लेकर आई है, जो आपकी मां ने बनाया है। मैंने कहा पर तुम्हारी मां को तो पैरों में तकलीफ है उन्हें चलते नहीं बनता है।

मेरे ससुर के स्वर्गवास के बाद बहुत कम ही घर से निकलती हैं, पत्नी बोली आप आराम से खाना खाइये मैं खाना खाने लगा।
कुछ देर बाद मेरे फटीचर दोस्त का फोन आया बोला हमारे लायक कोई काम हो तो बताना। मैंने मन में सोचा जो मुझसे उधार ले रखे हैं 3000 रुपये वही वापस नहीं किया, काम क्या बताऊं तुझे। फिर भी मैंने कहा ठीक है जरुरत होगी तो बता दूंगा और मुंह बना कर फोन काट दिया ।
16 दिनों तक मेरी पत्नी सिलेंडर ढ़ोती रही मेरा भाई और साला लाईन में लगकर सिलेंडर लाते रहे, फिर हालत में सुधार हुआ फिर 18 वें दिन मेरी अस्पताल से छुट्टी हुई ।
मुझे खुद पर गर्व था की मैंने कोरोना को हरा दिया मैं फूला नही समा रहा था।
घर पहुंच कर असली कहानी पता चली कि — मेरे इलाज में बहुत सारा रुपया लगा है। शहर के बड़े अस्पताल का बिल कई लाख था, कितना? ये तो नहीं पता पर मेरी पत्नी के सारे ज़ेवर जो उसने मुझसे लड़ – लड़ कर बनवाये थे बिक चुके थे।
मेरे साले के गले की चेन बिक चुकी थी जो मेरी पत्नी ने मुझसे साले की जनोई में 15 दिन रूठ कर जबरजस्ती दिलवाई थी, मेरा भाई जिस बाइक को अपनी जान से ज्यादा रखता था वो भी घर में दिखाई नहीं दे रही थी।
मेरी माँ जिस जमीन को जीते-जी नहीं बेचना चाहती थी मेरे स्वर्गीय बाबूजी की आखरी निशानी थी वो भी मेरे इलाज में बिक चुकी थी ।
मेरी पत्नी से लड़ाई होने पर मैं गुस्से में कहता था की जाओ अपनी माँ के घर चली जाओ वो मेरा ससुराल का घर भी गिरवी रखा जा चुका था, मेरे निठल्ले दोस्त ने जो मुझसे 3000 रुपये लिए थे वो 30,000 वापस करके गया था।
जिन्हें मैं किसी काम का नहीं समझता था वे मेरे जीवन को बचाने के लिये पूरे बिक चुके थे, मैं अकेला रोये जा रहा था बाकी सब लोग खुश थे।
क्योंकि मुझे लग रहा था सब कुछ चला गया, और उन्हें लग रहा था की मुझे बचा कर उन्होंने सब कुछ बचा लिया।
अब मुझे कोई भ्रम नहीं था कि मैंने कोरोना को हराया है, क्योंकि कोरोना को तो मेरे अपनों ने, मेरे परिवार ने हराया था । सब कुछ बिकने के बाद भी मुझे लग रहा था की आज दुनिया में मुझसे अमीर कोई नहीं है।
*यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं है अपितु हर उस इंसान की है जिसने कोरोना को नजदीक से देखा है।*
स्वस्थ रहें व मस्त रहें , ऊपर वाला सब ठीक करेगा । बस भगवान से प्रार्थना करें कि कोरोना की इस जंग में सब विजयी हों , हराने वाला तो ऊपर बैठा है । हम तो उससे मांग ही कर सकते हैं ।

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