वीकेंड कर्फ्यू या लॉक डाउन ! गुलजार रहने वाला बाजार वीरान !

प्रस्तुति: @कवि : सोमवारी लाल सकलानी, निशांत

वीकेंड कर्फ्यू या लॉक डाउन !
गुलजार रहने वाला बाजार वीरान !
कानून का डर या मौत का भय !
अंत भला तो सब भला।

1- कोरोना महामारी के कारण सदा गुलजार रहने वाले बाजार वीरान नजर आ रहे हैं। कोरोना महामारी के घातक दूसरी लहर ने एक बार फिर पिछले वर्ष के लॉक डाउन की याद दिला दी है । जब महीनों तक लॉकडाउन के कारण बाजार बंद रहे लोग घरों से बाहर नहीं निकले और कानून का पालन करते रहे । फल:स्वरूप सुरक्षित भी रहे। यद्यपि अर्थव्यवस्था रसातल में चली गई। लोगों को असुविधाओं से रू ब रू होना पड़ा। युवा वर्ग की नौकरियां चली गई।

रोजमर्रा की जिंदगी में कमाने वाले लोगों तथा निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोग सर्वाधिक प्रभावित हुए । बाजार व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई थी फिर भी लोगों ने कानून व्यवस्था को बनाकर रखा और कार्बेट महामारी का मुकाबला किया। जिसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए ।


2- इस वर्ष के आरंभ से ही लोगों ने जानबूझकर लापरवाही की। इस में सरकार ज्यादा दोषी है । चुनावी सभा और रैलियां होती रही गोष्ठियां चलती रही। लोग बेपरवाह एक दूसरे से हिलते मिलते गए । मास्क पहनना बंद कर दिया । सैनिटाइजेशन को लोग भूल गए थे । सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया।

3- जनवरी-फरवरी में तो ऐसा लगता था कि जैसे हम लोग अमर हो चुके हों और कभी रोग की चपेट में नहीं आएंगे। टीका आ जाने के कारण तो लोगों ने इसे रामबाण समझा और सोचा कि टीका उन्हें अमर बना देगा। यह लापरवाही आज संपूर्ण समाज को झेलनी पड़ रही है। पिछले वर्ष से भी बदत्तर स्थिति में हम पहुंच चुके हैं।
4- अभी भी समय है कि हम जीत जाएं और नियमों का पालन करें । शासन और प्रशासन को भी ज्यादा संजीदगी से इस कार्य को आगे बढ़ाना चाहिए। कम से कम एक -एक हफ्ते की गाइडलाइन बनानी चाहिए । जैसे कि महामारी पर अंकुश लग सके । यदि जीवन सुरक्षित रहेगा तो खानी -कमानी तो होती ही रहेगी । असहाय ,मजदूर ,अत्यंत गरीब तबके के लोगों, मजदूरों और छोटे व्यापारियों के हितों का सरकार को ध्यान रखना चाहिए।
5- अर्थ प्रबंध पर नियंत्रण होना चाहिए । बैंकिंग प्रतिष्ठान अनावश्यक लोगों को परेशान न करें बल्कि उनका सहयोग करें। शासकीय सेवा में कार्य करने वाले लोग अहंकार से दूर रहें और सार्वजनिक हित को सर्वोपरि समझे।
6- कोई भी बड़ा कार्य जब सरकार करती है तो समाज के असामाजिक तत्व उसका फायदा भी उठाते हैं । सन 1975 में लगने वाली इमरजेंसी (आपातकाल) रहा हो या उत्तराखंड आंदोलन के समय का समय रहा हो। यह हमने प्रत्यक्ष अपनी आंखों से देखा। आपातकाल के समय जब जमाखोरी ,मुनाफाखोरी ,लालफीताशाही , भ्रष्टाचार आदि अपने चरम पर पहुंच गई थे तो 26 जून 1975 को पूर्व माननीय प्रधानमंत्री जी ने व्यवस्था को कायम करने के लिए आपातकाल लगाया। यद्यपि उन्हें कालांतर में अपनी सरकार से ही हाथ धोना पड़ा । लेकिन उन्होंने जो कार्य कर दिया वह कार्य करना हर किसी के बस की बात नहीं है। इमरजेंसी के उस दौर में भी आपातकाल की आड़ में लोगों ने रिश्वतखोरी को बढ़ावा दिया। लोगों को गलत ढंग से प्रताड़ित किया । यहां तक कि अरेस्ट किया जेलों में बंद कर दिया आदि । इसी तरह असामाजिक तत्वों के द्वारा उत्तराखंड आंदोलन के समय भी जब पूरे पर्वतीय क्षेत्र के निवासी नए राज्य के लिए सड़कों पर उतर गए थे ,अपनी नौकरी तक दांव पर लगा कर के राज्य बनाने के लिए सड़कों पर आ चुके थे ,जो कि एक प्रकार का खुला विद्रोह था; उस समय भी कुछ सामाजिक असामाजिक तत्व शहर बाजारों में अतिक्रमण करते रहे। जंगलात की भूमि को कब्जाते रहे , नाले -खालो की जमीन पर कब्जा करते रहे । इस प्रकार के तत्व हर समय उत्पन्न होते रहे हैं और होते रहेंगे।
7- जरूरत इस बात की है कि हमें कानून का पालन करना चाहिए। सरकार के दिए गए दिशा-निर्देशों को मानना चाहिए। जनहित के मुद्दों को ध्यान में रखना चाहिए। किसान ,मजदूर और गरीब तबके का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कोई व्यक्ति पड़ोस में भूखा ना सो पाए।
8- महामारी के समय संदेहवाद से दूर रहकर, सकारात्मक सोच उत्पन्न करके हम लोग अपने मनोबल को बढ़ाएं रखने के साथ, अप्रत्याशित पूर्व प्रत्यादित डर से भी मुक्त रहेंगे।
9- कहावत है , “अंत भला तो सब भला ” यदि अभी भी हम कोविड के नियमों का पूर्ण रुप से पालन करें ,इलाज करवाएं, दूरी बनाकर रखें ,मास्क लगाएं , अनावश्यक बाहर न निकले ,तो काफी हद तक इस बीमारी पर नियंत्रण पा सकते हैं ।
10- कोरोना का टीका भी तभी काम करेगा जब हम अपने प्रति स्वयं अधिक संवेदनशील रहेंगे ,यह नहीं कि कानून के डर के कारण बाजार बंद कर दें और पिछले दरवाजों से मुनाफा कमाने की सोचें।
11- देवभूमि उत्तराखंड के लोग आज भी ईश्वर पर विश्वास करते हैं और राजज्ञाओं को देव वचन मानते हैं। राजशाही के जमाने भी यहां राजा को बोलांदा बद्री माना जाता था । कमोबेश आज भी वही स्थिति है और हम लोग आदेश नियमों और निर्देशों का पालन करने वाले लोग हैं ।
12- शासकीय आदेशों के साथ साथ हम प्राकृतिक आदेशों और ईश्वरीय शक्ति का भी पालन करने वाले हैं। सत्ता मद और धन मद में चूर व्यक्ति यदि कानूनों का उल्लंघन करें तो उन्हें भी उचित दंड दिया जाना चाहिए क्योंकि प्रजातांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक महत्वपूर्ण है। प्रत्येक का जीवन महत्वपूर्ण है । यह सरकार का भी दायित्व है । समाज का भी दायित्व है। परिवार का भी दायित्व है और प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है।

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