पद्मश्री सुंदरलाल बहुगुणा: चिपको आंदोलन के एक युग का अवसान

सरहद का साक्षी,

रिपोर्ट: @ कवि : सोमवारी लाल सकलानी निशांत

“आज हिमालय जागेगा, क्रूर कुल्हड़ा भागेगा।
मिट्टी पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार।”

विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन के ये नारे हिमालय की वादियों में कभी खूब गूंजते थे।

आज हिमालय जागेगा, क्रूर कुल्हड़ा भागेगा। मिट्टी पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार।"
80 के दशक में जब अंधाधुंध विकास के नाम पर लाखों हरे पेड़ों की बलि चढ़ाई जा रही थी। अंधे और अनियोजित विकास की हवा में पूरा उत्तराखंड ही नहीं बल्कि समूचा हिमालय क्षेत्र माफियाओं के द्वारा दिखाए गए सब्जबाग का गुलाम बनता जा रहा था। हरे पेड़ों को काटकर चौतरफा कोयले के भट्टों को लगाकर ,चंबा मसूरी फल पट्टी के नाम पर करोड़ों पेड़ों की बलि की गई थी। उस दौर में राजनेता, शासक- प्रशासक, समाज के अनेकों व्यक्ति और स्थानीय निवासी भी प्रत्यक्ष, परोक्ष रूप से सम्मिलित थे।

ठेकेदार को कोयला चाहिए था। स्लीपर चाहिए था ।वन संपदा चाहिए थी। जंगलात्यों को ऐशो आराम की जिंदगी, दौलत शोहरत, मुर्ग मुसल्लम और दबदबा चाहिए था। सरकार को पैसा चाहिए था और स्थानीय लोगों को रोजगार। बड़े-बड़े राजनेताओं से लेकर जनप्रतिनिधियों तक को प्लॉट चाहिए थे। इसलिए अधिकांश की अपनी आंखें मूंदी हुई थी।

वन माफिया, खनन माफिया ,शराब माफिया हावी थे। और उनके सम्मुख किसी को जुबान खोलने की हिम्मत नहीं थी। ऐसे दौर में देखते ही देखते संपूर्ण उत्तराखंड में चिपको आंदोलन की गूंज उठती हुई अंतरराष्ट्रीय वायुमंडल में गूंजने लगी। सरकारों की आंखें खुलने लगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठने के कारण तथाकथित जनप्रतिनिधि भी मुंह बंद कराने में अक्षम रहे।

चिपको आंदोलन में मातृशक्ति ,समाज के प्रबुद्ध वर्ग, समाज सेवी आंदोलनकारियों का उत्कृष्ट योगदान रहा है। हिमालय को बचाने के लिए “करो या मरो” की तर्ज पर या आंदोलन शुरू हुए थे और सफल भी हुए।

23 नवंबर सन 1979 को परम आदरणीय स्वर्गीय श्री सुंदरलाल बहुगुणा जी हैंड माइक हाथ में लटकाए हुये, राजकीय इंटर कॉलेज पुजार गांव सकलना में वन माफियाओं के विरुद्ध समर्थन के लिए पहुंचे । मैं उस समय इंटरमीडिएट का छात्र था तथा राजकीय इंटर कॉलेज पुजार गांव का जनरल मॉनिटर था। 470 के करीब उस समय विद्यालय के छात्र संख्या थी और स्वर्गीय श्री महेशानंद शर्मा विद्यालय के प्रधानाचार्य थे ।

उन्होंने मुझे अलग बुलाकर काफी समझाया कि मैं नेतागिरी के चक्कर में न पड़ूं और अपनी पढ़ाई पर ध्यान दूं। “आंदोलन करना छात्रों के लिए उचित नहीं है। तू गरीब घर का लड़का है । पढ़ने लिखने में होशियार है। पढ़ाई के बाद अच्छी खासी नौकरी मिल जाएगी तो तकदीर सुधर जाएगी।”

इस प्रकार प्रधानाचार्य महोदय ने मुझे समझाया ,जो कि यह एक आदर्श प्रधानाचार्य के लिए जरूरी भी था। लेकिन मैंने प्रधानाचार्य जी की बात नहीं मानी और प्रसिद्ध पर्यावरणविद् श्री विश्वेश्वर दत्त सकलानी और श्री चतर सिंह नकोटि के साथ पैदल बुरांसखंडा होते हुए खुरेत पुजाल्डी के जंगलों में जा पहुंचा। उस समय खुरेट पुजालडी, जड़ धार गांव, इंडवाल गांव , कुडीयाल गांव , सौड़, काखवाड़ी, कुमार गांव , गढ़वाल गांव कुमार गांव, आदि गांवों के असंख्य छात्र राजकीय इंटर कॉलेज पुजार गांव में अध्यनरत थे, क्योंकि राजकीय इंटर कॉलेज नगराजाधार ,बमुंड और राजकीय इंटर कॉलेज नागदेव पथल्ड उस समय पूर्व माध्यमिक विद्यालय की थे। इसलिए मुझे वहां छात्र साथियों को इकट्ठा करने में कोई परेशानी नहीं हुई।

रात्रि का अंधकार होने वाला था, खुरेट पुजाल्डी के ऊपर जंगलों में वन माफियाओं के आरे कुल्हाड़ चल रहे थे। ठेकेदार की लेवर कार्य में निमग्न थी। जंगलात के लोग भी मुर्ग मुसल्लम में तल्लीन थे। मेरे अंदर वह समय कॉमन सेंस का अभाव था और उग्र आंदोलन पर मैं विश्वास करता था ।

बस ! वहां पहुंचते ही साथी छात्रों के द्वारा उग्र आंदोलन शुरू कर दिया। ठेकेदारों के आरे कुल्हाड़ों को फेंक दिया। राशन बिखेर दी। चनो की बोरियां जो भरी हुई थी उनको वहीं जमीन पर उड़ेल दिया। कुल मिलाकर यह उग्र आंदोलन था। आदरणीय स्वर्गीय सुंदरलाल बहुगुणा जी इस प्रकार के आंदोलन के कदापि पक्ष में नहीं थे लेकिन उनकी मजबूरी थी। इसलिए कुछ कर नहीं सके और उन्होंने सारा उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया।

उसके बाद हम निकटवर्ती गावों में चले गए और सुबह जंगल में आने के बाद कह कर स्वर्गीय श्री बहुगुणा जी से विदाई ली। खुरेट पुजाल्डी चिपको आंदोलन की सूचना चारों तरफ फैल गई।

रात खुलते ही वन विभाग के अधिकारी, पर्यावरणविद स्वर्गीय श्री कुंवर प्रसून, स्वर्गीय श्री प्रताप शिखर, आदरणीय श्री धूम सिंह नेगी, आदरणीय श्री विजय जड़धारी ,आदरणीय श्री साहब सिंह सजवान आदि वहां पहुंच गए।

मैं तो अपना कार्य कर चुका था। नवंबर माह में जनपद क्रीड़ा प्रतियोगिताओं त्रिपथगा में सम्मिलित होने के लिए भी पुरानी टिहरी भी जाना था। इसलिए कुछ समय बाद में वहां से चला आया । सबसे महत्वपूर्ण बात थी -पिताजी के भय की। पिताजी के कानों तक मेरे उग्र आंदोलन की खबर पहुंच चुकी थी और यह पिताजी का बर्दाश्त नहीं कर सकते थे, क्योंकि वह फौजी व्यक्ति थे और अनुशासन की अपेक्षा करते थे, न कि आंदोलन की। लेकिन इस छोटी सी अवधि में आदरणीय स्वर्गीय श्री सुंदरलाल बहुगुणा जी को जानने समझने का अवसर प्राप्त हो गया। जिनकी छाप और छवि आजीवन मन मस्तिष्क में अंकित हो गई।

अक्टूबर 1989 में ठीक 10 वर्ष बाद स्वर्गीय श्री सुंदरलाल बहुगुणा जी का सानिध्य पाने का पुन अवसर प्राप्त हुआ। स्थान था – क्रिश्चियन रिट्रीट सेंटर ,राजपुर। (देहरादून ) ।

संपूर्ण उत्तराखंड तथा अनेकों हिमालयन क्षेत्र के लोग ऑक्सफैम की इस बैठक में सम्मिलित हुए थे। “टेक्नोलॉजी ऑफ हिल्स” पर मेरा आख्यान भी हुआ था,जिसकी बहुगुणा जी द्वारा सराहना की गई थी। इस बैठक में जयंतो बंधोपाध्याय ,बंदना बंधोपाध्याय ( शिवा) जगमोहन रौतेला, स्वामी मनमथन ,श्री राजीव नयन सकलानी तथा श्री सुंदरलाल बहुगुणा आदि लब्ध प्रतिष्ठित पर्यावरणविद तथा हिमालयन तकनीकी के विशेषज्ञ शामिल थे ।

03 दिन तक चली इस सेमिनार में अनेकों बातें सीखने को मिली और अनेक महान पुरुषों से साक्षात्कार भी हुआ। अक्टूबर माह की चांदनी रात में, खुले प्रांगण में ,बाहर बैठे हुए श्री बहुगुणा जी के संस्मरण सुने। कहानियां प्रस्तुत की गई तथा पर्यावरण संदेश आदि पर भी चर्चा खूब हुई ।श्री बहुगुणा जी से और अधिक निकटता आ गई।

जिसके बाद बांध विरोधी आंदोलन के दौरान अनेक बार स्वर्गीय श्री सुंदरलाल बहुगुणा जी से भेंट होती रही । स्वर्गीय कुंवर प्रसून जी की जयंती के अवसर पर भी बहुगुणा जी से मिलन होता गया । लेकिन जब वह देहरादून चले गए तब से उनसे कभी संपर्क मुश्किल ही हुआ हो।

आदरणीय स्वर्गीय श्री सुंदरलाल बहुगुणा जी की बहुमुखी प्रतिभा का मैं हमेशा कायल रहा हूं। हमेशा उनके पर्यावरण साहित्य को पढ़ता हूं और काफी कुछ उससे सीखता भी हूं।

पर्यावरण के क्षेत्र में वह अपनी बात सरल अंदाज में कर लेते हैं। वह मर्मस्पर्शी के साथ-साथ आम जनमानस को उद्वेलित करने की शक्ति रखती है। महान व्यक्ति का विरोध भी होता है क्योंकि कुछ अवसरवादी या कुंठित लोग जो कुछ कर नहीं पाते हैं, वह केवल टीका टिप्पणी और छींटाकशी में ही अपना मोक्ष पाते हैं । लेकिन स्वर्गीय श्री सुंदरलाल बहुगुणा जी अजातशत्रु थे।

उन्होंने बुराइयों का विरोध किया। बुराइयों का प्रतिकार किया लेकिन ओछी और घटिया टीका टिप्पणी वाले करने वाले लोगों की बातों नजरंदाज किया।

पद्मविभूषण, प्रतिष्ठित जमुनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित स्वर्गीय श्री बहुगुणा जी के देहावसान के साथ ही पर्यावरण के एक युग का अंत हो गया। वे उस पीढ़ी के नायक रहे हैं जब लोगों को पर्यावरण के प्रति इतनी संवेदना नहीं थी । न पर्यावरण को इतना महत्व दिया जाता था।

कोरोना काल में आज लोक ऑक्सीजन के लिए तड़प रहे हैं। स्वच्छ हवा, स्वच्छ पर्यावरण ,स्वस्थ जीवन के लिए तरस रहे हैं। यह सपना स्वर्गीय श्री बहुगुणा ने देखा और धरातल पर क्रियान्वित करने का भरसक प्रयास किया।

उनके देहावसान पर मैं उन्हें अपनी सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं तथा ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि अपने श्री चरणों में उन्हें स्थान दें।

” धार मति पाणी / खाल पर डाला।
डाला लगावा / खाला खाला ।” (बहुगुणा)

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