बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष आलेख: भगवान बुद्ध जो 10 वर्ष की आयु में शस्त्र शास्त्रों में पारंगत हो गए थे

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर विशेष आलेख: भगवान बुद्ध जो 10 वर्ष की आयु में शस्त्र शास्त्रों में पारंगत हो गए थे

सरहद का साक्षी, @कवि :सोमवारी लाल सकलानी, निशांत

आज बुद्ध पूर्णिमा है । भगवान बुद्ध को स्मरण करना आज के दिवस पर समीचीन है । ईसा मसीह से 557 वर्ष पूर्व महारानी महामाया के गर्भ से एक बालक का जन्म हुआ। जिनका नाम सिद्धार्थ था ।वह कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के पुत्र थे। विधि का विधान देखो, उनके जन्म के 01 सप्ताह के बाद ही उनकी माता स्वर्ग सिधार गई और उनका लालन-पालन उनकी सौतेली माता प्रजापति ने अपने सर ले लिया ।
भगवान बुद्ध अनेकों नामों से प्रसिद्ध हैं जैसे बुद्ध, सिद्धार्थ, गौतम, शाक्य मुनि, जिन, भगवत इत्यादि इसके अलावा भी उन के अनेकों नाम हैं जो कि उनके अनुयाई और श्रद्धालु भक्तों के द्वारा संबोधित होते हैं।
10 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ शस्त्र शास्त्रों में पारंगत हो गए थे। उनका एक सौतेला भाई और था जिसका नाम नंद था तथा चचेरा भाई देवदत्त था जो बहुत ही दुष्ट प्रवृति का था । जब सिद्धार्थ ने यौवन काल में पदार्पण किया तो संसार की दुनियादारी से उनका मोहभंग होने लगा । राजा को चिंता है कि उनका पुत्र कहीं सन्यासी न बन जाए, क्योंकि राजा पूर्व भविष्यवाणी से चिंतित थे। इसलिए उन्होंने एक सुंदर राजकुमारी यशोधरा से उनका विवाह कर दिया। विवाह के कुछ समय (10वर्ष ) तक सिद्धार्थ भोग विलास में जीवन यापन करते रहे ।लेकिन संसार से उनका मन विरक्त होने लगा।
एक दिन उन्होंने शहर जाने की इच्छा अपने पिता से प्रकट की। राजा ने पूरे शहर में मुनादी पीटा दी थी कि कोई भी बुरा दृश्य सिद्धार्थ के सम्मुख न आए, लेकिन विधि का विधान था। एक वृद्ध व्यक्ति उन्हें दिखाई दिया। जब उन्होंने अपने मित्र, सारथी चन्ना से उसके बारे में पूछा तो चन्ना ने बताया कि महाराज एक दिन सभी की यही दशा होती है। यह बूढ़ा व्यक्ति है । फिर दूसरी बार शहर यात्रा के समय उन्हें एक अपाहिज रोगी दिखाई दिया और उन्होंने अपने सारथी से जब उसके बारे में पूछा तो चन्ना ने बताया प्रत्येक मनुष्य को रोग हो सकता है और तीसरी बार जब वह शहर के भ्रमण में निकले तो उन्हें एक डेड बॉडी (मृत शरीर) दिखाई दिया । जिसको दाह संस्कार के लिए ले जाया जा रहा था। उन्होंने अपने सारथी से पूछा , “यह क्या है ?” चन्ना ने उत्तर दिया , “महाराज प्रत्येक व्यक्ति का एक यही हश्र होता है । जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु एक दिन निश्चित है”। राजकुमार बो,” महल लौट चलो । मैं अब आगे और नहीं जाऊंगा । मैंने वह सब देख लिया जिसे मैं देखना नहीं चाहता “।
इसके बाद सिद्धार्थ एक दिन अपनी पत्नी और पुत्र को छोड़कर के निर्माण में चले गए। 12 वर्षों तक शास्त्रों का अध्ययन किया घोर तपस्या की लेकिन ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। उसके बाद उन्हे ज्ञानप्राप्त हुआ।उन्होंने सत्य चतुष्ठ्य का प्रतिपादन किया।
क) जब तक यह संसार है तब तक दुख और क्लेश भी है।
ख) दुख का मूल कारण सांसारिक पदार्थों में आसक्ति है।
ग) मोक्ष प्राप्ति का उपाय आत्म संयम और इंद्रीय निरोध है ।
घ)निर्माण के इच्छुक भिक्षुओं के लिए अष्ट चक्र का साधन आवश्यक है और प्रत्येक व्यक्ति को इसका अभ्यास करना चाहिए ।
वह पुण्य तीर्थ जहां पर भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ बोधगया के नाम से प्रसिद्ध हुआ और बाद में सम्राट अशोक ने वहां पर एक विशाल और भव्य मंदिर बनाया । जब राजा शुद्धोधन को कपिलवस्तु में यह समाचार मिला के सिद्धार्थ बुद्ध बन गए हैं और राजगृह में विराजमान हैं तो उन्होंने अपने मित्र कालउदयन को उन्हे लाने के लिए भेजा । भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ कपिलवस्तु पहुंचे और राज प्रसाद के बाहर वटवृक्ष था उसके नीचे कुटीर डाल दिया । उनके मुख मंडल पर तेज चमक रहा था कि उस पर दृष्टि नहीं टिकती थी। राजा और उसके भाई दोनों उनकी शरण में आ गए ।सब छोटे बड़े शहर वासी उनके दर्शनों के लिए आए लेकिन यशोधरा नहीं आई।
भगवान बुद्ध स्वयं यशोधरा को मिलने उसके महल की ओर गये। अब यशोदा भगवान बुध के चरणों में लोट गई और फफक फफक कर रोने लगी तो बुद्धदेव ने उसको सांत्वना दी और शीघ्र ही महल से बाहर निकल गए। उनका सौतेला भाई नंद भी भिक्षु बन गया । उनके पिता शुद्धोधन ने भी उनके के आगे सर झुका दिया । उनका चचेरा भाई आनंद भी उनका अनुयाई और श्रद्धालु भक्त बन गया।
जब 01 सप्ताह कपिलवस्तु में हो गया तो राजा शुद्धोधन नहीं चाहते थे कि उनका पुत्र राहुल उनसे मिले क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं वह भी सन्यासी न बन जाए। भगवान बुद्ध समझ गए और चल दिए।
80 वर्ष की आयु में भगवान बुद्ध ने शरीर त्याग किया। कुशीनारा नदी के तट पर उन्होंने स्नान किया खूब जल पिया और उसके बाद उनका देहावसान हो गया ।
भगवान बुद्ध की शिक्षाओं में सबसे महत्वपूर्ण बात सरल का और साधारण ढंग से प्रभावशाली शैली में कही गई सत्य बातें हैं। उन्होंने लोगों को बीच का रास्ता अपनाने का उपदेश दिया। प्रेम, क्षमाशील तब उदारता और सहिष्णुता उनकी शिक्षा का मुख्य सिद्धांत था। उन्होंने अपने शिष्यों को समझाया और ये प्रतिज्ञाएं उनको दोहराई, हिंसा नहीं करूंगा । चोरी नहीं करूंगा। पवित्र जीवन व्यतीत करूंगा । झूठ नहीं बोलूंगा ।मांस आदि का सेवन नहीं करूंगा। नियत समय पर ही भोजन करूंगा ।नाच गाने से प्रयोजन नहीं रखूंगा ।गद्दी पर नहीं सोऊंगा ।आभूषणों को प्रयोग में नहीं लाऊंगा और धन संग्रहण नहीं करूंगा।
भगवान बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं के अंतर्गत कहा कि इस संसार में घृणा को घृणा के द्वारा दूर नहीं किया जा सकता बरन वह प्यार से दूर होती है । आओ हम सब आनंद से जीवन व्यतीत करें ।जो लोग हम से घृणा करते हैं हम उन्हें घृणा न करें । घृणा करने वालों के बीच में हम लोग घृणा विहीन हो कर रहे ।
अंत में बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर मैं अपने समस्त मित्रों ,शुभचिंतकों, छात्र- छात्राओं और प्राणी मात्र को भगवान बुद्ध के बताए गए मार्ग का अनुसरण करने की अपील करता हूं ।
कोरोना काल में भगवान बुद्ध की शिक्षाओं पर अमल हो। लोग संयमित जीवन व्यतीत करें ।उचित आहार-विहार का ध्यान रखें ताकि कोरोना जैसी महामारी से भी बचा जा सके। यही बुद्ध पूर्णिमा का औचित्य है ।

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