हकीकत: छाती कंटेनमेंट जोन, कोरोना से बचने को स्वयं की सजगता अनिवार्य

नकोट, टिहरी गढ़वाल: 05 मई का दिन, समय करीबन साढे़ 11 बजे। बन्द हो चुके राजकीय प्राथमिक विद्यालय छाती के भवन में स्वास्थ्य विभाग की टीम पहंुची। उन्होंने गांव के बुखार, जुखाम एवं खांसी से पीड़ित लोगों के करीबन 100 लोगों के आरटी पीसीआर सेम्पल लिए और पुनः अपने गन्त्व्य को चल दिए। फोन नम्बर पर मैसेज आया कि आप स्वयं को आइसोलेट कर लें और जांच रिपोर्ट की प्रतीक्षा करें।

हकीकत: छाती कंटेनमेंट जोन, कोरोना से बचने को स्वयं की सजगता अनिवार्य

मुझे पिछले कुछ दिनों से ही बुखार व खांसी की शिकायत थी, बुखार तो दवा खाने से ठीक हो रहा था, मगर खांसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी, दवाओं के साथ खांसी के सीरप की दो बोतलें मैं पहले ही खत्म कर चुका था। जब खांसी ठीक नहीं हुई तो मैंने अपने बालक को 07 मई सुबह को चम्बा भेज दिया और कुछ दवाओं का नाम लिखकर उससे वहां से दवा मंगवा ली। लेकिन किसे पता कि कोरोना टेस्ट की रिपोर्ट पाॅजिटिव आएगी।

दोपहर बाद कोरोना टेस्ट रिपोर्ट आयी तो उसमें मैं ही क्या, बालक भी पाॅजिटिव निकल गया। मैं घबरा गया था, क्योंकि मैसेज फोन पर आ रहा था और बालक अभी तक घर भी नहीं पहुंचा था। सोचा कहीं उसको मैसेज मिल गया तो वह घबरा जाएगा। कहीं कोई दिक्कत न हो। उसे फोन किया तो जबाब मिला कि मैं पहंुचने वाला हूं। तब जाकर मन थोड़ा शान्त हुआ। जब बालक घर पहंुच गया तो शांति मिली।

तदोपरान्त मैंने स्वास्थ्य केन्द्र नकोट में फोन से सम्पर्क किया कि हमारे गांव में इतने पाॅजिटिव हैं दवाओं की व्यवस्था करवाइए। नकोट अस्पताल में डा0 मुस्कीम एवं आरपी भट्ट जी से बात हुई। बताया गया कि दवाओं  के किट हेतु आशा, आंगनबाड़ी अथवा प्रधान किसी को भी चम्बा भेजो। मगर कोई भी दवा लाने को तैयार नहीं। तब जाकर स्वयं चम्बा से स्वास्थ्य विभाग द्वारा अपना आदमी भेजकर दवायें गांव तक पहंुचाई गई। मगर यह नहीं बताया गया कि दवाएं किस हिसाब से खानी हैं।

आगे और जांच रिपोर्ट आयी तो पूरे गांव में 42 पाॅजिटिव हो गए। प्रशासन ने पूरे गांव को कंटेनमेंट जोन घोषित करके सीज करने का काम शुरु कर दिया। सभी कोरोना पाॅजिटिव लोगों के लिए दवा किट की व्यवस्था हो गई।

सरकार तीरथ सिंह रावत की और किट आयी त्रिवेन्द्र सरकार की।

जी हां, यहां पर यह उल्लेख करना नहीं भूलूंगा कि मेरी खांसी की अधिकता और गम्भीरता को चम्बा पीएचसी के एमओआईसी द्वारा समझा गया और मेरे लिए खांसी का सीरप पृथक से अवश्व भिजवाया गया, जिसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार भी हूं और रहूंगा। बीमारी के कई दिनों बाद शायद ही आज लिख पाता, मगर स्वयं की सजगता, घरेलू आयुर्वेदिक उपचार आदि न अपनाये होते तो आज मेरी स्थिति अकथनीय ही होती! इसलिए यदि स्वयं सजग नहीं रहोगे तो कोरोना से बचना आसान नहीं।

यहां पर यह गौरकरणीय है कि सरकार तीरथ सिंह रावत की और किट आयी त्रिवेन्द्र सरकार की। अब दवा किटों का नमूना देखिए! बाहर त्रिवेन्द्र सिंह रावत जी का फोटो एवं दवाओं की सूची- संलग्न सूची में से केवल चित्रों में दिख रही दवायें ही किट में मौजूद थी, किसी में विटामिन सी, तो किसी में नहीं। 42 कोरोना पाॅजिटिव और केवल 05 बिना सेल के आॅक्सीमीटर और 05 ही थर्मामीटर। आॅक्सीमीटर के सेल न मिलने की शिकायत भी की गई? जिस पर जबाब मिला कि बाजार से खरीदिए। व्यक्तिगत मिले तो खरीदे मगर सार्वजनिक में सेल कौन खरीदे? यह भी एक बिडम्बना ही कहिए।

चलो यहीं पर कहानी समाप्त नहीं होती। प्रशासन ने गांव को कंटेनमेन्ट जोन घोषित कर मुख्यद्वारों पर पहरेदारी लगवा दी। यह नहीं सोचा कि गांव वालों को सब्जी, दूध आदि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी की जानी है। किसी भी प्रकार की व्यवस्था आज 12 मई तक नहीं हो पायी थी। गांव में जलापूर्ति तो पम्पिंग लाईन से हो रही है, लेकिन सभी ग्रामवासी पीने का पानी हैण्डपम्प से लाते हैं, हैण्डपम्प से पूर्व श्री महादेव मन्दिर वाले रास्ते पर बना गेट बन्द कर दिया गया है, जिससे लोगों को पेयजल के लिए परेशानी उठानी पड़ रही है। न ही आज तक किसी प्रकार के कीट नाशक आदि दवाओं का छिडकाव किया गया, लिहाजा पीड़ितों एवं आम नागरिकों में खासा रोष होना स्वाभाविक है।

जिला प्रशासन ने गांव को सील कर दिया, किसी भी प्रकार की सुविधा प्रदान करने की जहमत नहीं उठायी। गांव के कोरोना पाॅजिटिव की दशा क्या है, उन पर क्या बीत रही होगी। इसकी किसी को परवाह नहीं। सब भगवान भरोसे?

मुख्यद्वारों पर पहरेदार लगाकर प्रशासन का मन्त्व्य कहीं यह तो नहीं कि गांव से कोरोना बाहर न जाए और अमन चैन अन्दर न आये। बिना किसी व्यवस्थाओं के यही अंदाजा लगाया जा सकता है।

पूरे 06 दिन का समय व्यवतीत हो चुका है। स्वास्थ्य विभाग के कुछ आला अधिकारियों द्वारा फोन पर सम्पर्क के अलावा किसी भी स्वास्थ्य दल ने गांव के बीच आकर कोरोना संक्रमितों का हालचाल पूछने की जहमत नहीं उठायी। केवल आधी-अधूरी दवा किटें भेजकर ही जिला प्रशासन एवं स्वास्थ्य विभाग ने इतिश्री कर ली।

इन परिस्थितियों में अंदाजा लगाया जा सकता है कि अधिक पाॅजिटिव पाए जाने पर क्षेत्र विशेष या गांव को कंटेनमेंट जोन बनाकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों से दूर भागना चाहता है। अन्य प्रशासनिक अधिकारी यदि कोई आ भी रहा है तो वह केवल सड़क के निकट बसे लोगों के साथ फोटो खींचकर और उसे साझा का खानापूर्ति कर रहा है, जिसके उदाहरण सोशल मीडिया पर देखने को मिल सकते हैं और प्रशासन के प्रेस नोट में भी। यदि ऐसा नहीं तो कोरोना संक्रमितों की उचित देखभाल क्यों नहीं?

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