कविता: नफरत को यहां जगह नहीं,जहां प्रेम है स्वर्ग वहीं।

कविता: नफरत को यहां जगह नहीं,जहां प्रेम है स्वर्ग वहीं।

सरहद का साक्षी: @कवि : सोमवारी लाल सकलानी,निशांत

नफरत को यहां जगह नहीं, जहां प्रेम है स्वर्ग वहीं।
प्यार पोती का यहां मिला,जन्नत में है फूल खिला।
यहां न लालच स्वार्थ है,न कमी स्नेह अरु प्रेम की है,
कैवल्य प्रेम मन हर्षित है,सूखा गाल शिशु ने चूमा है।
नफरत को यहां जगह नहीं।
नाना नातिन साथी हैं,इन्हे यह दुनिया सुंदर भाती है।
प्यार धरा का कवि पाया, लगा शीश शिव का साया।
यह प्रेम -प्रपंच नही, धर्म सनातन – शाश्वत मर्म यहीं।
हम देख चुके संसार जहान ,नाना नातिन प्रेम महान।
नफरत को यहां जगह नहीं।
जब होता हूं उदास कभी,शिशु स्नेह मिल सुखी तभी।
लगता है वरदान मिला,शिशु रूप धर ईश्वर प्रकट हुआ।
निर्मल निश्छल प्यार जहां,मिल जाता नित भगवान वहां।
कभी रूप धर कुदरत का, कभी स्वरूप मे शिशुओं का।
नफरत को यहां जगह नहीं।
देखो ! यह जीवन धारा है।यह दिव्य धरा नित रसधारा है।
शिशुओं के सदा करीब रहो,बरना जीवन भर गरीब रहो ।
भाग्य पुरुषार्थ से शिक्षक था,शिशु बच्चों का प्यार मिला।
प्रौढ़ावस्था नीरसता लाई, रस भरने जीवन नातिन आई।
नफरत को यहां जगह नहीं।
बात्सल्य उमड़ कर उर आया, पुलकित मन जीवन भाया।
यौवन का क्रोध अरु कष्ट गया,अब अहंकार उर नहीं रहा।
दिन गुलजार है बना हुआ,यह शिशु प्यार भगवान दिया।
छोड़ निरर्थक बातों को, तरजीह दो अब रिश्ते नातों को।
नफरत को यहां जगह नहीं।

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