कविता: मई मास भी  दे गया दगा !

कविता: मई मास भी  दे गया दगा !

कवि: सोमवारी लाल सकलानी,निशांत

ठंडा मौसम,सर्द हवा,मई मास भी दे गया दगा।
पंखा कूलर चलना था,हीटर स्वेटर निकल गया।
पेड़ बांज के कांप रहे,दांत खिटक कर टूट रहे।
पहाड़ पनगोले फूट रहे,बादल फट कर रूठ रहे।

बाहर कोरोना सर्दी है,विधि की कैसी बेदर्दी है।
मई मास का समय बुरा,फिर भी कुछ पी रहे सुरा।
ओला वृष्टि भयंकर है,शायद सोया शिव शंकर है।
कौन जगाएगा अब उसको, कौन मनाएगा उसको !
वह तो बर्फानी बाबा है, चौक बे -मौसम खाला है।

कौन भगाए ठंड बुरी, हिल गई शायद रसा धुरी !
मन बहलाने बाहर गया,कोरोना कर्फ्यू डरा रहा।
नलखा यूनियन टूट गई, बाजार बंद है बुरी घड़ी।
पैसा बैंक में पड़ा हुआ,धक्के खाने खड़ा हुआ।
महंगाई की मार बड़ी,मुसीबत कैसी आन पड़ी।

रात काटनी मुश्किल है, रजाई ऊपर कम्बल है।
कोरोना तो द्वार खड़ा, सुबह देर तक पड़ा रहा।
निशांत सूरज उग आया, ठंड सीत को खा डाला।
ज्वर बुखार भी चला गया, बच जाऊंगा मुझे लगा।

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