कविता: भाई ! यहां तो सब शिकारी हैं !

कविता: ऑडिट बहुत खतरनाक है उसका

@कवि : सोमवारी लाल सकलानी, निशांत

फाख्ते ने पूछा,” कवि कैसे हो ?
क्यों समाधि लगाए बैठे हो !
सुवहाना मौसम- हरियाली का आलम है,
लेकिन चिड़िया तक मौन है !”

“भाई ! यहां कर्फ्यू -कोरोना है !
नजदीक मत आना, रोग लग जायेगा !
हमने तुम्हे कभी पिंजड़े में बंद किया था,
वही पाप आज बंद होकर भोग रहें हैं।

बहेलिया बन तुम्हे मारा। डिश बना कर खाया।
कभी चिकन तो कभी बिरयानी सूप बनाया।
बीमार पड़ गए तो, सार्स फ्लू बता तुम्हे मारा।
भाई ,आज अपनी करनी का फल हमने पाया”।

“इतिहास गुनाहों से भरा है।
मार – काट लहू से सना है।
भूल जाओ कविवर , दुखांत !
नवसृजन के पंख लगा उड़।

चलो तुमने पश्चताव तो किया !
बरना यहां तो सब शिकारी खड़े हैं !
व्याध, खटीक, कशाई , बहेलिया ।
अपना ख्याल रखना, मैं तो चला”।

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