कविता: बाबा को वाणी ने मारा !

बाबा को वाणी ने मारा !

सरहद का साक्षी: @कवि: सोमवारी लाल सकलानी निशांत

बाबा का कोई तोड़ नहीं, बोली मे कोई जोड़ नहीं।
योग में परचम लहराया,व्यापार भी खूब चमकाया।
राजनीति बाबा बोला,पेप्सी कोला पर धावा बोला,
कांग्रेस ने जब घेरा, महिला वसन धर दिल्ली छोड़ा।
बाबा का कोई तोड़ नहीं !
बाबा तो सन्यासी हैं! या बाबा कुशल व्यापारी हैं।
पतंजलि उत्पाद बड़ा, बाबा चिमटा लिए है खड़ा।
दोष दूसरों के सर जो मढ़ा,वह बाबा स्कूल पढ़ा।
घी गो -मूत्र परवान चढ़ा, शहद शिरप समुद्र बना।
बाबा का कोई तोड़ नहीं !
किसको गाली दे जावे, छोड़ लंगोटी भग जावे।
धर्म संस्कृति की बात कहे,राजनीति मे नही पड़े।
नया शिगूफा बाबा फोड़ा ,एलोपैथी को कहा कूड़ा!
डॉक्टर बाबा से रूठे, बुरी जुबान कह करम फूटे।
बाबा का कोई तोड़ नहीं !
हरियाणी वह ग्वाला है , उत्तराखंडी वह ज्वाला है।
योग गुरु वह डाक्टर है, अपने विषय में मास्टर है।
किसको कब क्या कह जावे ,थैला उठा भग जावे !
किस मिट्टी का बना हुआ, सत्ता को ललकार रहा।
बाबा का कोई तोड़ नहीं !
आयुर्वेद बुखार चढ़ा, एलोपैथी तन मन दर्द बढ़ा।
बैद्य खुशी से झूमे हैं,डॉक्टर साहब दुख में डूबे हैं।
नोटिस बाबा को आया, चिमटा जमीन फटकारा।
चढ़ गया बाबा के सिर पारा,बाबा वाणी ने मारा।
बाबा का कोई तोड़ नहीं !
यह कैसे भारत सन्यासी ! व्यापार जगत अधिवासी।
धर्म परायण बाबा है , फिर नफरत का क्यों मारा है।
धर्म सनातन समरस है, बाबा क्यों बरबस बे बस है।
राजनीति धर्म व्यापार साथ,सही ढंग कह बाबा बात।
बाबा का कोई तोड़ नहीं !

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