श्री कुंदन लाल बहगुणा जिनका हर वाक्य सारगर्भित होता था

श्री कुंदन लाल बहगुणा जिनका हर वाक्य सारगर्भित होता था

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा,

शुद्धोऽसि रे तात न तेऽस्ति नाम*
*कृतं हि ते कल्पनयाधुनैव ।*
*पञ्चात्मकं देहमिदं तवैत-*
*न्नैवास्य त्वं रोदिषि कस्य हेतो: ।।

“आज जब लक्ष्मी फोटो स्टूडियो में बैठा था तो अचानक इस फोटो पर दृष्टि अटक गई , और कहीं अतीत में मन चला गया । याद आयी प्रात: स्मरणीय श्री राम दयाल बहुगुणा जी की जब उनकी तिवारी मैं उन सभी विभूतियों के साथ मैं भी बैठा था । आप श्री कुन्दन लाल बहुगुणा जी ने जो वर्णन प्रारम्भ किया जिज्ञासा से – बस उसे सुनता ही रहा । प्रसंग किसी यजमान का था , चर्चा उसकी कुण्डली पर थी । आपकी वाक् चातुर्यता ने उनके पूरे खानदान का वर्णन कर दिया। कारण सन्तान न होने का था समाधान शिवार्चन पर वार्ता लम्बी ।

किया तो हरिवंश पुराण भी जा सकता है पर उसके साथ शतचण्डी करनी पड़ेगी कौन इतना खर्च करेगा। ऐसे कई मौके आए जब आप के साथ समय व्यतीत करने का सुअवसर मिला , हास्य-व्यंग्य के साथ काम की बातें भी होती थी । आज वह समय कहां गया , न कोई पास में आने को तैयार, न कुछ पूछने की लालसा, बस एक ही काम धन कहां से आये। ऐसी विभूति को अवश्य स्मरण करना चाहिए , यह विचार प्रकट हुआं तो अपना कर्त्तव्य समझते हुए २३ जून सन् १९४० को अवतरित हुए आपको अपने श्रद्धासुमन समर्पित करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि भी अर्पित कर रहा हूं, तथा कोटि-कोटि नमन करता हूं। आपको गुरु की सेवा का पारितोषिक मिला आपका हर वाक्य सारगर्भित होता था , सम्भवतः मनु के उपदेश का आपने अक्षरशः पालन किया।

*यथा खनन्खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति ।
*तथा गुरुगतां विद्यांशुश्रूषुरधिगच्छति ।।

अनुपम व्यक्तित्व के धनी आप प्रात: स्मरणीय श्री दिलमणि बहुगुणा जी की इकलौती संतान थे , धार्मिक वृत्ति के परिवार में जन्मे आपने पिताजी के साथ कर्मकाण्ड, ज्योतिष के बल पर अपना जीवन यापन पौरोहित्य कर्म करते हुए घर पर कितनी ही बार श्रीमद्भागवत पुराण का आयोजन किया , जो ब्राह्मण समाज के लिए पथ प्रदर्शन का कार्य था ।

आपकी सुपुत्री श्रीमती तृप्ता के विवाह की रश्म पूरी करने का सुअवसर मुझे मिला था , तथा सुपुत्र श्री आशाराम बहुगुणा का परिणय भी हमारे द्वारा ही पूरा किया गया । आपकी वंश वेल पर यदि दृष्टि निपात किया जाय तो यह अवगत होकर हम स्वयं को धन्य महसूस करते हैं कि पण्डित दयालधर बहुगुणा जी (दयालु) के चार सुपुत्रों में आप सबसे कनिष्ठ सुपुत्र स्व०श्री महेश्वर बहुगुणा जी के पौत्र थे । उनके सबसे बड़े भाई स्व० श्री हृदय राम बहुगुणा जी के श्री हरि शरण बहुगुणा जी उनके तीन सुपुत्रों में श्री सोहनलाल बहुगुणा जी ,श्री (चैतु) चैतराम बहुगुणा जी,व श्री मुकन्द राम बहुगुणा जी जिनके सुपुत्र स्व० श्री पूर्णा नन्द बहुगुणा जी व उनके दो सुपुत्र श्री कैलाश बहुगुणा जी व — हुए ।

दूसरे बड़े भाई स्व० श्री मंगला नन्द बहुगुणा जी जिनके सुपुत्र स्व० श्री प्रीत मणि बहुगुणा जी व उनके सुपुत्र स्व० श्री मोहन लाल बहुगुणा जी के दो सुपुत्र स्व० श्री देवेन्द्र दत्त बहुगुणा जी जिनके सुपुत्र श्री कृष्णा बहुगुणा एवं श्री – हैं , दूसरे श्री ऋषिराम बहुगुणा जी अपने सुपुत्रों के साथ देहरादून में अवस्थित है । तीसरे भाई स्व० श्री सदानन्द बहुगुणा जी के दो सुपुत्र श्री जुठिया जिनके दो सुपुत्र हुए तथा दूसरे स्व०श्री मूर्खल्या बहुगुणा जी हुए वंश वृद्धि आगे बढ़ रही है । सभी लोगों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं अभिनन्दन कर आगे बढ़ रहा हूं ।

चौदह अक्टूबर सन् २०१५ को अपने सुपुत्रों को अपने कार्यक्षेत्र में भेज कर अपनी दोनों सहधर्मिणियों की एवं सुपुत्र श्री सेवक राम बहुगुणा की गोद में अन्तिम स्वांस ली । जीवन में अनेक उतार चढाव आये , एक बार ऐसा प्रतीत हो रहा था कि इस वंश की वृद्धि असम्भव है तो पुनर्विवाह किया उस गृह लक्ष्मी के घर आते ही जिन माता की कोख से केवल बेटियों ने ही जन्म लिया था , पुनः भर गई व घर में एक बालक का आगमन हुआ जिसका नाम करण बहुत धूमधाम से किया व नाम रखा सेवक राम बहुगुणा । होता भी क्यों नहीं माता-पिता की सेवा का अनुपम फल जो मिला ।

*यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम् ।
*न तस्य निष्कृति: शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ।।

*फिर क्या था जहां एक पुत्र की अभिलाषा थी वहां प्रथम धर्म पत्नी के दो सुपुत्र दूसरे श्री आशाराम बहुगुणा तथा दूसरी सहधर्मिणी से श्री शोभा राम बहुगुणा, श्री विनोद बहुगुणा श्री विकास बहुगुणा व श्री विवेक बहुगुणा सभी भाई सुयोग्य एवं होनहार है अपने पिताश्री की शिक्षा पर चलते हुए अपने कर्त्तव्यों का पालन कर रहे हैं । यहां तक कि अपने भानजों की आजीविका का ध्यान भी रखते हैं । ऐसे सभी मनस्वियों के प्रति बहुत बहुत शुभकामनाएं व्यक्त करता हूं । तथा पूरे वंश में जो विभूतियां ब्रह्मलीन हो गई है उन्हें पुनः भावभीनी श्रद्धांजलि के साथ श्रद्धिसुमन समर्पित करते हुए इस क्षेत्र की खुशहाली व उन्नति की कामना करता हूं ।

*इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।*
*न चाशुश्रूषवे वाच्यं‌ न च मां योऽभ्यसूयति ।।

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