श्री अमर देव उनियाल जी ऐसा व्यक्तित्व जिनके अन्दर परख थी व्यक्ति व समय की

श्री अमर देव उनियाल जी ऐसा व्यक्तित्व जिनके अन्दर परख थी व्यक्ति व समय की

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा,

श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ।।

“‘ श्रद्धावान् , जितेन्द्रिय और साधन परायण व्यक्ति ही ज्ञान को प्राप्त करते हैं और ज्ञान प्राप्त कर ईश्वर प्राप्ति कर परम शान्ति को प्राप्त होते हैं । ऐसे ही मनस्वी व्यक्तित्व के धनी थे मखलोगी पट्टी के अन्तर्गत मथीसारी में अवतरित हुए प्रात: स्मरणीय श्री अमर देव उनियाल जी जिन्होंने अपने पिता श्री भवानी दत्त जी का नाम रोशन किया । जीवन और मृत्यु किसी के बस में नहीं है , फिर भी एक विचित्र संयोग था कि आपका जन्म माह भाद्रपद व यहां से प्रयाण का माह भी भाद्रपद ही रहा ।

सन् १९२५ में उदय और सन् १९९७ में महाप्रयाण। अपने पिता की अकेली सन्तान आपका व्यक्तित्व उत्कृष्टता से परिपूर्ण रहा। ऋषिकेश में मध्यमा तक शिक्षा अर्जित कर घर पर कर्मकाण्ड की शिक्षा प्राप्त की व वीढ़ के ज्योतिषी पण्डित श्री दत्त ममगांई जी से ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त किया। आपका देदीप्यमान चेहरा भुलाये नहीं भूलता। सम्बन्ध अलग बात है , गुण अलग-अलग हैं। आपके अंदर परख थी, व्यक्ति की भी व समय की भी । और प्रखर बुद्धि और विवेक शीलता अलग, न भय , न झिझक स्पष्ट वक्तव्य आपका परम गुण था । कभी कभी सोचता हूं कि आपका गुण इस जन के लिए सम्भवतः अवगुण सिद्ध होता दिखाई दे रहा है (आज-कल हम स्पष्ट बोलने से अपने शत्रुओं की वृद्धि ही करते हैं, अतः लोग ठकुर सुहाती बात बोलते हैं ) अस्तु । वाणी तो विषैली नहीं होनी चाहिए।

व्यक्ति को द्विजिह्वा भी नहीं होना चाहिए , मन मुख एक जैसा होना श्रेयस्कर ही होता है । हमारे वेदों व पुराणों में भी वर्णित है कि “स्पष्ट वक्ता न बंचक: ” । इस सद्गुण के धनी थे आप , एक वाकया याद आ रहा है एक दिन एक आचार्य श्री के सम्मुख आपने कहा कि ये सज्जन मात्र मध्यमा है और बहुत सारी कथाएं कर खूब धनार्जन कर रहे हैं । उन्हें बहुत बुरा तो लगा ही होगा क्योंकि बाद में मुझे अवगत करवा रहे थे कि मैंने स्नातकोत्तर उपाधि ले रखी है।

वास्तविक आलोचना से तो कभी घबराना नहीं चाहिए? निन्दा बहुत बहुत बुरी होती है , किसी की निन्दा करना बहुत बड़ा दुर्गुण है ! ? क्या है? किसी की योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाने का उद्देश्य ? जो नहीं होना चाहिए । इस तरह उन्हें आश्वस्त भी किया । उनसे यह निवेदन भी किया कि मैं आपकी योग्यता का काहिल हूं , डिग्री से क्या अभिप्राय ? ऐसे महामानव के दो चाचाश्री थे, बड़े पण्डित ईश्वरी दत्त उनियाल जी जिनके तीन सुपुत्र बड़े स्व०श्री सत्य प्रसाद उनियाल जी जिनके चार सुपुत्र एवं एक सुपुत्री है , सुपुत्री की ससुराल सावली में ही है। दूसरे श्री जगदीश उनियाल जी जिनके पांच सुपुत्र है जो अपने- अपने व्यवसाय में लगे हैं। तीसरे सुपुत्र श्री रामानन्द उनियाल जी कोठी फैगुल में रहते हैं । दूसरे चाचाजी स्व० श्री रामा नन्द उनियाल जी जिनके एक सुपुत्र स्व० श्री गोविन्द प्रसाद उनियाल जी जो देहरादून चले गए थे, अब श्री गोविन्द उनियाल जी की चार सुपुत्रियां जिनमें से दो का विवाह कर रखा है व ससुराल सावली ही है । उन सबकी मंगल कामना करता हूं । “”
“‘ आप अपने धर्म के पक्के , शुद्ध आचरण की प्रति मूर्ति व कर्मठता से लवालव रहे । आपके परम मित्रों में उत्तराखंड के अद्वितीय मनीषी , उद्भट विद्वान श्री जयानन्द उनियाल जी थे।

आप धर्म मार्ग का अनुसरण ही किया करते थे , धर्म की परिभाषा बहुत बड़ी है पर सत्य भाषण, दयालुता , पवित्रता , तपस्वी जीवन , व तितीक्षा जिसके जीवन में है तो उससे बड़ा धार्मिक कोई नहीं हो सकता । शायद श्रीकृष्ण का वरद हस्त था आप पर , यही था आपका परम लक्ष्य –

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: ।।

वाणी और चरित्र के धनी मनीषियों से ही यह भूमि टिकी हुई है । आपके चार सुपुत्र व एक सुपुत्री है । बड़े सुपुत्र श्री दर्शन लाल उनियाल दिल्ली पुलिस में सब इंस्पेक्टर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद दिल्ली में एक पुत्र व एक सुपुत्री के साथ( पुत्री को विवाह बन्धन में बांध कर) रह रहे हैं जो हमारे बहनोई हैं । दूसरे सुपुत्र श्री रमेश उनियाल भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हो कर विगत पञ्चवर्षीय में ग्राम प्रधान पद पर आसीन रहे ! आपका कार्य काल एक मिशाल है इस बार भी गांव के लोगों की इच्छा आपकों ही प्रधान बनाने की थी , पर शायद आपने नहीं चाहा । अपने कार्य काल में यथा सम्भव मदद की , पकड़- पकड़ कर जांव कार्ड बनवाने में पूरी सहायता की ।

रोजगार के लिए प्रोत्साहित किया । किसी से उत्कोच की लालसा नहीं रखी , प्राय: हर तरह से पूरी मदद की । आपके दो सुपुत्र व एक सुपुत्री है । बड़े सुपुत्र व पुत्री का विवाह संस्कार कर दिया है । तीसरे सुपुत्र श्री गिरीश प्रसाद उनियाल जी इण्टर कॉलेज में प्रवक्ता है आपकी ससुराल भी सावली ही है दो सुपुत्र व दो सुपुत्रियां है , पुत्रियों का विवाह कर दिया है । आप आज कल कुछ अस्वस्थ हैं ईश्वर से शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना करता हूं। चौथे सुपुत्र श्री कामेश्वर प्रसाद उनियाल सुयोग्य ब्राह्मण दो पुत्रियों व एक पुत्र के पिता हैं । सावली से आपको बहुत प्यार था, अतः अपनी लाडली बिटिया को सावली के शास्त्री श्री सोहनलाल बहुगुणा को दिया, किन्तु विधि के विधान को कौन समझेगा उसी के अनुसार सुपुत्री श्रीमती सरोजनी भी अकाल कवलित होने से दोनों परिवारों को रोता बिलखता छोड़ चिरनिंद्रा में सो गई, केवल यादें शेष है, आप सभी दिवंगत विभूतियों को कोटि-कोटि नमन करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं तथा ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि दिव्य विभूतियां अपने क्षेत्र पर अपनी कृपा दृष्टि बना कर रखेंगी।

हम सभी तो आपके बताए मार्ग का अनुसरण ही करेंगे। तभी तो भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा –

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।

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