कविता: हम भी हैं धृष्ट मानव की करतूत के मारे

पेड़ का श्राप पड़ेगा

देख रहा हूं इस दरख़्त को अर्द्ध सदी से,
हर मौसम अरु हर ऋतु ,मास बसंत में।
नव पल्लव बौर कोंपले देखी इस तरु में,
और नग्न रूप भी देखा ऋतु पतझड़ में।

बड़वानल से झुलस गए हैं तरुवर सारे,
झुलस गए हैं निरपराध दुर्भाग्य के मारे।
यह कुदरत की मार नहीं थी तरुवर प्यारे,
हम भी हैं धृष्ट मानव की करतूत के मारे।

ढह जाएगा वृक्ष एक दिन सुंदर प्यारा,
देता आया जीवन रस जग को न्यारा।
आज नर पशु मानव ने आग लगाकर!
जला दिया है मेरा तन किया किनारा।

एक दिवस दुष्ट मानव ! तुम भी जलकर,
रेगिस्तान में तड़फ तड़फकर राख बनोगे।
सुन ले कृतघ्न जन तुम भी खाक मिलोगे,
मेरे अभिशाप से कभी नहीं उबर सकोगे !

@कवि :सोमवारी लाल सकलानी,निशांत।
सुमन कॉलोनी चंबा – टिहरी गढ़वाल।

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