कविता: भाग जा दानव कोरोना !

@कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत। चंबा, टिहरी गढ़वाल।

@कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत

एक नन्हे फूल को लख, खाली पन अब ना रहा।
देख कर प्यारी धरा को, मन – मुदित है हो रहा।
अदाओं से अब सुमन की,मन पुलकित हो रहा।
बेचैनियों के पर्वतों को, प्यारी धरा लख टूटता।

एक प्यारा बड़ा भौंरा, आज आंगन मंडरा रहा।
मुद्दतों के बाद भ्रमर,मधु गुंजार वाटिका में भरा।
जंगलों में आग देखी,ज्वालाओं से जलती मही।
घोषलों में चूजे -परिंदे,अवशेष तक हैं अब नहीं।

कैसे खिला यह कुसुम प्यारा,आज मेरे बाग में।
मुद्दतों के बाद अलिसुत ,कैसे कोरोना काल में!
यह भ्रमर कोई ना निशाचर,निशांत प्यारा दूत है।
कटु निराशा बेचैनियों बिच,कोरोना का काल है।

एक नन्हे फूल ने हंसी से, मुदित मन कर दिया।
अदाओं से प्रिय धरा की ,मन मुदित हर्षित हुआ।
देवदूत भ्रमर रूप में जब,आज मेरे दर आ गया,
दुष्ट कोरोना का दर्द सारा,क्षण भर में जाता रहा।

रूप कुदरत देख कर मैं , स्वप्न में फिर खो रहा।
क्षणभर मे कटु दर्द सारा, मन से गायब हो गया।
भाग जा दानव कोरोना, अब इस मही संसार से,
मत सता तू रोग दानव,जीवटता अभी है जान में।

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