सुुरकुट पर्वत  के चारों तरफ आग ही आग

रिपोर्ट:  @ कवि : सोमवारी लाल सकलानी, निशांत

चम्बा: बिगत कई दिनों से सुरकंडा (सुुरकुट पर्वत)  के चारों  तरफ जंगल धू-धू  कर जल रहे हैं, जंगल की  आग इतनी विकराल रूप धारण किए हुए है कि स्थानीय लोग जान हथेली पर करके आग को काबू करने के लिए प्रयासरत हैं ।

कल जड़धार गांव के आसपास भयंकर आग लगी थी जिसे स्थानीय लोगों ने बमुश्किल नियंत्रण में किया। वन विभाग की ओर से भी आग बुझाने की पहल की जा रही है। लेकिन यह ऐसा है जैसे कि भूसे के ढेर पर लट मारना ।

सुुरकुट पर्वत  के चारों तरफ आग ही आग
विगत वर्षों से गर्मियों के सीजन में छुटपुट आग लगती थी । लेकिन कभी-कभी या विकराल रूप धारण कर देती है और खरबों की संपत्ति को पलक झपकते हुए ही भस्म कर देती है। करोड़ों की संख्या में वन संपदा के अलावा दुर्लभ जड़ी बूटियां, बेशकीमती वनस्पति, पशु पक्षी, कीट पतंग जल करके समाप्त हो जाते हैं।


आज सुरकंडा पर्वत के दोनों ओर एक तरफ खुरेत पुजाल्डी तो दूसरी ओर सकलाना के जंगल कल से लगी आग के कारण राख हो गए। बड़ी संख्या में स्थानीय निवासियों ने सुबह से ही आग बुझाना शुरू किया और हर पल सतर्क हैं। सकलाना रेंज के अधिकारी और कर्मचारी भी मौके पर आए लेकिन तब तक जंगल बड़ी मात्रा मे खाक हो गया।

सुबह मैने सकलाना रेंज के वन क्षेत्राधिकारी से संपर्क किया। उन्होंने त्वरित कार्रवाई करते हुए वनकर्मियो को भेजा लेकिन आग इतनी प्रचंड थी कि वहां तक पुहुचना मुश्किल था। एस डी ओ भी मौके पर थे। हम जंगल तो नहीं बचा सके लेकिन अपने घर, छानियां बचाने मे सफल रहे।

नैलबागी रेंज में आग बुझाते फ़ायर टीम वर्कर्स
पृथ्वी के पंचभूत तत्व जीवन के आधार हैं । यही पंचभूत तत्व मानवीय लापरवाही तथा माननीय बुराइयों के कारण जीवन के विनाश का कारण भी हैं । केवल मनुष्य के जीवन का ही नहीं बल्कि प्राणी जगत के विनाश का भी कारण हैं। सृष्टि का विकास आग ,हवा, पानी ,आकाश और पृथ्वी जैसे तत्वों से हुआ है और इन्ही से महाप्रलय आता है । संपूर्ण सृष्टि के विनाश का प्रतीक है। संसार का अंत या तो पानी से होता है या तो आग से । प्राकृतिक आपदाओं का कारण भी कुछ हद तक मानव है।
यह समय जो चारों तरफ भयंकर आग लगी है वह प्राकृतिक नहीं बल्कि मानव जनित है। यह आग स्वयं नहीं लगी है बल्कि लगाई गई है।

यह आग लापरवाही के कारण नहीं बल्कि मानवीय शरारत और धृष्टता के कारण विकराल रूप धारण किए हुई है।
सरकार और विभाग का तो कहना ही क्या है। उनके पास कोई ठोस नीति न होने के कारण केवल आपदा के समय ही हाथ-पांव मारने की आदत है । बसंत आगमन से पूर्व हमेशा अपनी बात तथ्यात्मक रूप से सम्मुख रखता हूं अफसोस है बड़े कानोता किया बात आज तक कभी नहीं पहुंचती है जो कि आज मैं पुनः रिपीट कर रहा हूं।
01_ गर्मियों का सीजन आने से पूर्व ही सरकार, प्रशासन और विभाग को चाहिए क्या स्थानीय लोगों के साथ मिल बैठकर ग्राम पंचायत स्तर पर बैठक रखी जाए । जानकार लोगों को उस में आमंत्रित किया जाए। सुझाव लिए जाएं और एक ठोस नीति बनाई जाए। इसके लिए बेरोजगार स्थानीय युवाओं को 03 महीने के लिए स्वयं सेवी वन रक्षक रखा जाए और उन्हें उचित मानदेय दिया जाए । प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर अगर पांच दस स्वयंसेवी सदस्यों की 03 महीने के लिए नियुक्ति की जाए और जवाबदेही भी सुनिश्चित की जाए तो यह समस्या का समाधान हो सकता है।
02_जंगलात की सड़कों और संपर्क मार्गों का निर्माण किया जाए निर्माण किया जाय ताकि आग के समय पर कार्यवाही हो सके।
03_वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी फायर सीजन पर मौके पर रहे और स्थानीय लोगों से मदद की गुजारिश भी करें।
04_ पतझड़ सीजन के तुरंत बाद लाइन काट दें ताकि आग लगने की स्थिति में एक छोटे से भूभाग में ही नुकसान हो न के संपूर्ण जंगल जलकर का तबाह हो जाए।
05_ यथा समय जन जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जाएं तथा कार्यवाही धरातल पर हो न कि केवल कागजों पर।
06_जागरूक लोग, जड़ धार गांव के निवासियों की तरह ,जंगल को पुत्रवत माने। जंगल को पनपाएं, संरक्षण करें और आग लगने की स्थिति पर एकजुट होकर जंगल को बचाने का भी कार्य करें न कि तमाशबीन बने रहें ।
07_मातृशक्ति करुणामय और अधिक संवेदनशील हैं, भूल कर भी इस समय घास के लालच में आड़े न लगाएं।
08_ जंगल में आग लगने पर वन विभाग कर्मचारियों को भी सूचित करें।
09_ बुजुर्ग, रोगी और बच्चे जंगल की आग बुझाने का दुस्साहस न करें, इससे काम करने वालों को भी परेशानी होती है और एकाग्रता हटती है।
10_ जंगल बचाएं – जीवन बचाएं।

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