परहित धर्म सरस नहीं भाई, पर पीड़ा समनहिं अधमाई

आखिर में यह भी  नहीं रहेगा

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा,
आज कल प्राय: बाजार में हर वस्तु उपलब्ध हो जाती है , हर खरीददार अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए बाजार पर निर्भर है । जब भी हम बाजार जाते हैं तो अपनी आवश्यकताओं की वस्तु खरीदकर ले आते हैं। आंख कान खोल कर ही बाजार जाते हैं , घर से सामान की सूची भी ले जाते हैं , पर कभी कभी बाजार से कूड़ा भी उठा कर ले आते हैं , गलती से या हड़बड़ी में ।

वैसे ही दृष्टिकोण के विषयक भी अलग अलग धारणाएं हैं , नकारात्मक और सकारात्मक यह मानव मस्तिष्क के अनुरूप है ,जो मुझे अच्छा लगता है आवश्यक नहीं कि किसी अन्य को भी अच्छा ही लगे । हम सबको अपने अनुरूप नहीं बना सकते । इस सन्दर्भ में मुझे एक मुल्क की याद ताजा हो रही हैं ।

शायद एक गांव — जहां प्राय: मर्यादाओं का उल्लंघन , जन्म से ही व्यक्ति अहंकारी , सहोदरों के प्रति अन्याय यहां तक कि पिता अपने पुत्रों को बेदखल करने हेतु बिवश या तत्पर कभी कभी तो न्यायालय में वाद दायर कर दिया जाता था ।

कौन पिता होगा ऐसा जो बेटों का अहित चाहेगा , पर दृष्टिकोण अलग-अलग होने से सोचने की क्षमता भी अलग । हो सकता है यह सब किसी की भक्ति का परिणाम हो या कान के घूरें में कचरा भरने वाले की कुशलता हो । रहीम दास ने कितनी सही बात कही थी , कभी चिन्तन किया जा सकता है –

यों रहीम सुख होत है , बढ़त देखी निज गोत ।*
*जों बडरी अखियां निरखी , आंखिन को सुख होत ।।*
*यह परम्परा का विषय भी हो सकता है । परिणाम उनकी दृष्टि में उपयुक्त भी हो सकते हैं , या –

कभी कभी यह भी देखा जाता है कि हम जिस भी वस्तु को दूसरों के लिए मांगते हैं वह हमें ही मिल जाती है । यह मांगने का दृष्टिकोण है। यदि हम पड़ोसी के लिए उन्नति मांगते हैं तो हमारी उन्नति होती है , यदि हित चाहते हैं तो हमारा हित ही होता है और यदि अहित तो —– !

कभी कभी अनुभव कहता है कि जब-जब किसी के लिए अहित की प्रार्थना की तो अपना अहित अवश्य हुआ । ईश्वर हमारे साथ है यह केवल पुस्तकीय ज्ञानं नहीं है अपितु सार्वभौम सत्य है । जब तक हम ईश्वर से अच्छी प्रार्थना करते हैं तो हमारी प्रार्थना पूरी होती है किन्तु जब भी बुरी प्रार्थना की तो वह कभी भी पूरी नहीं हुई ।

अभिप्राय यह है कि यदि हम सत्यताओं पर विचार करें तो केवल हित कामना ही करते रहें इसी में सबकी भलाई है , दूसरे का हित हो न हो पर अपना अवश्य होगा । हां यह किसी गांव की सत्यता है , गांव का नाम उल्लेख करना उपयुक्त नहीं है परन्तु यदि किसी गांव पर खरा उतरता है तो यह एक संयोग ही होगा ? अन्यथा नहीं समझेंगे । पर मनन चिन्तन अवश्य करेंगे । विचारणीय तो है ही ! ?

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