गौं ह्वेगीन परदेश

 

डा. दलीपसिंह बिष्ट

घर छोड़ी, घरवार छोड़ी अब त गौं भी छोड्याली।

शहरू मां रैक अब त गौं परदेश ह्वे ग्याई।।

धारा छोड़ी, पनेरा छोड़ीन पहाड़ भी छोड्याली।

शहरू मा रैक अब त पहाड़ परेदश ह्वे ग्याई।।

गौरू बाछुरा छोड़ी बण जाणू भी छोड्याली।

भै-बन्द, गौं गळा सब्बी धाणी छोड्याली।।

माल्या सारी, बेल्या सारी मल्छू फुलगी।

बेटी-ब्वारी सब्बी परदेशू चलीगी।।

गौं-गळा मा क्वी नी रैगी बांजा पड़या छन।

खुद कैमा मिटौण अब क्वी रैया नी छन।।

घौर गौं-गळा बिटी पैली रैवार औन्दु छ।

अब त गौं गळा मा क्वी भी नी रयू छी।।

बै-बाबा यकुली घौर छूइ भी कैमा लाण।

कनी मजबूरी छी हमारी घौर कखान जाण।।

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