स्व. श्री हरि प्रसाद बहुगुणा जी व उनकी सहधर्मिणी स्व. श्रीमती पूर्णा देवी बहुगुणा जी को श्रीमद्भागवत सप्ताह के ज्ञानयज्ञ में श्रद्धांजलि

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा

मातापितृवच: कार्यं सत्पुत्रेण यशस्विना ।

पूजनं च तयो: कार्यं पोषणं पालनं तथा ।।

माता-पिता का पालन-पोषण तथा पूजन सत्पुत्र अपना कर्त्तव्य समझते हैं । आज ऐसे  ही मनीषी महामानव को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करने की घड़ी उपलब्ध हुई है। अपनी इस माटी को आपने कृतार्थ कर अपने पूर्वजों के उत्तरदायित्वों का विधिवत निर्वहन कर वंशजों को प्रेरणा प्रदान कर सुशिक्षित व  संस्कारवान बनाने का यथा सम्भव प्रयास किया उन्हें अपनी भावभीनी श्रृद्धांजलि समर्पित कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं ।  यह मेरा फर्ज भी है ।

Lt. Sh. Hari Prasad Bahuguna

Lt. Sh. Hari Prasad Bahuguna

श्री हरि प्रसाद बहुगुणा जी ने स्व० श्री ईश्वरी दत्त बहुगुणा जी के तीन सुपुत्रों में बड़े सुपुत्र स्व० श्री रूप राम बहुगुणा जी के जेष्ठ सुपुत्र  स्व० श्री श्री कृष्ण  बहुगुणा जी के कनिष्ठ सुपुत्र के रुप में जन्म ग्रहण किया । आपके दो अग्रज स्व० श्री वाचस्पति बहुगुणा जी की सम्भवतः वंश वृद्धि नहीं हुई । दूसरे अग्रज स्व० श्री किशोरी लाल बहुगुणा जी ने अपने तीन सुपुत्रों को श्री शिव प्रसाद बहुगुणा व उनके दो भाइयों को अपना उत्तर दायित्व सौंपकर इस भवसागर से विदा ली ।

श्री शिव प्रसाद बहुगुणा कुशाग्र बुद्धि का सुयोग्य नव युवक है आप सबके लिए मंगल कामना। आप का जन्म दस अप्रैल सन् १९३२ में सावली गांव की पवित्र भूमि में हुआ माता-पिता की अभिलाषा थी कि आप संस्कृत की सुशिक्षा ग्रहण कर पुराण, न्याय व ज्योतिष के प्रकाण्ड पण्डित बन कर इस गांव की माटी का नाम रोशन कर यशस्वी जीवन यापन करें और आपने किया भी वही, आप ने शास्त्री तक शिक्षा प्राप्त कर पिताश्री  के न चाहते हुए भी पहले पंचायत मंत्री के रूप में फिर शिक्षा विभाग में शिक्षक के रूप में सेवा प्रारम्भ की । बचपन कुछ नाजुक होता है , आपको तब देखा जब आप नरेंद्र नगर इण्टर कॉलेज में शिक्षक थे व परिषदीय परीक्षाओं में निरीक्षण हेतु चम्बा आए थे । तब मैं हाई स्कूल की परीक्षा दे रहा था , दूसरे दिन संस्कृत का पेपर होना था आपने श्याम को पूछा कि कल के प्रश्नपत्र में यह भी आ सकता है । उत्तर बताओ ? –  

 उष्णोदहति चांगार शीतं कृष्णायते करम् ।

मुझे ज्ञात कहां ! उसका उत्तर भी उन्होंने ही रटाया अन्य और भी वाक्य याद करवाए । अल्प मति हमें कहां समझ , थोड़ा बहुत जो पढ़ा उसे ही बहुत समझा । परीक्षा में श्रेणी क्या होती है ?  यह ज्ञान भी नहीं था । पर अगले दिन प्रश्नपत्र में भले ही वह नहीं आया फिर भी निराशा हाथ नहीं लगी । मेरी अवधारणा में आप योगी थे क्योंकि योगी सबसे श्रेष्ठ होता है। शायद गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को योगी बनने की सलाह दी । 

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिक: ।

कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ।।

 प्रत्येक व्यक्ति का नजरिया अलग अलग होता है , परखने का , समझने का , देखने का । इसके बाद आपसे ठीक मुलाकात तब हुई जब आप चम्बा राजकीय संस्कृत महाविद्यालय में प्रधानाचार्य थे,  मैं भी अल्प शिक्षित होने के बाद आपके पास गया तो आपने जीवन के बहुत महत्वपूर्ण बिंदुओं पर मेरा ध्यान आकृष्ट किया। अपना  राजकीय सेवा करने का कारण भी अवगत करवाया । आपके अन्दर के मानव ने इस अल्पवय बालक पर अपनी कृपा दृष्टि बना कर उपकृत किया । यही मेरा सौभाग्य भी था । भले ही अपनी नासमझी के कारण जीवन के सच को भांपने में असमर्थ रहा, पर आपका दृष्टिकोण सजगता की ओर ले जाने वाला ही था।  आपके चाचा श्री श्री हरि कृष्ण बहुगुणा जी को अपने श्रद्धासुमन कुछ दिन पूर्व अर्पित करने का सुअवसर मिला था और उसी श्रृंखला में आपके दादा जी के दोनों अनुजों प्रात: स्मरणीय श्री भगीरथ प्रसाद बहुगुणा जी व उनके सुपुत्र स्व० श्री सोहनलाल बहुगुणा जी व उनके सुपुत्र स्व० श्री काशी राम बहुगुणा जी को तथा स्व० श्री रुद्रमणि बहुगुणा जी जिनकी वंश वृद्धि नहीं हुई को भी अपनी भावभीनी श्रृद्धांजलि अर्पित की थी , आज भी पुनः श्रृद्धासुमन अर्पित कर रहा हूं ।  स्व० श्री काशी राम बहुगुणा जी के सुपुत्र श्री मनमोहन बहुगुणा को मंगलमय भविष्य की शुभकामना सम्प्रेषित ।

  सेवा निवृत्ति के बाद आपने मां पुण्यासिनी की उपासना के साथ कर्मकाण्ड व ज्योतिष को बढ़ावा देने का सफल प्रयास किया । इस कार्य में आपके बड़े सुपुत्र श्री उमा धर बहुगुणा ने स्तुत्य भूमिका का निर्वहन किया व त्रिस्कन्ध ज्योतिष में महत्वपूर्ण योगदान दे कर गणित , होरा व फलित (सिद्धान्त)  में गहन अध्ययन कर आज त्रिकालदर्शी की भूमिका निभा रहे हैं,  ऐसे मनीषी को हार्दिक बधाई व नमन । दूसरे सुपुत्र श्री पुष्प राज बहुगुणा जी भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हो कर सड़क के निकट अपना आशियाना बना कर रह रहे थे कि आलवेदर रोड़ ने भानिया वाला जाने के लिए विबश कर दिया ,  तृतीय सुपुत्र श्री शम्भू प्रसाद बहुगुणा शिक्षा विभाग में प्रशासनिक अधिकारी के पद पर कार्य कर रहे हैं , और चतुर्थ सुपुत्र श्री राजेश बहुगुणा जी भी शिक्षा विभाग में शिक्षक के रूप में कार्य रत हैं । बिटिया श्रीमती कल्पना अपनी ससुराल में सुसंस्कारों से पली बढ़ी अपनी सुयोग्यता का परिचय देते हुए वहां के समाज को सुसंस्कृत कर रही है। आप सब को मंगलमय भविष्य हेतु शुभासंशा । “”‘

वरमेको गुणीपुत्रो न च मूर्ख शतान्यपि ।

एकश्चन्द्रस्तमोहन्ति न च तारागणैरपि ।।

श्रीमती पूर्णा देवी बहुगुणा जी, जिन्होंने पांगर गांव में सन् १९४० को जन्म लिया व १९५७ में आपके साथ विवाह बन्धन में बन्ध कर आई और  गत वर्ष २५ जनवरी सन् २०२० को इस गांव की माटी को अलविदा कह कर स्वर्ग सिधार गई थी, ११ फरवरी २०२१ को आपकी सहधर्मिणी का वार्षिक एकोदिष्ट श्राद्धकर्म हुआ , जो  श्रीमद्भागवत पुराण यज्ञ के साथ सम्पन्न हुआ की पावन वेला पर आपको जिनका यशस्वी शरीर अचानक न कोई बीमारी, न पीड़ा प्रात: काल जलपान के बाद कुर्सी में बैठ कर कुछ अध्ययन के साथ हृदयाघात से अकाल कवलित हो गया। अपनी सहधर्मिणी व चारों बेटों की गोद में यह यश शरीर  ग्यारह अप्रैल सन् २००२ को छोड़कर अन्तिम यात्रा के लिए प्रयाण किया।

आपके लिए आज हमारे पास केवल श्रद्धासुमन ही हैं अर्पण के लिए । अतः कोटि-कोटि नमन करते हुए समस्त ग्राम वासियों के साथ श्रृद्धांजलि समर्पित करता हूं तथा समस्त दिवंगत विभूतियों को भी श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए इस क्षेत्र के हितार्थ आप सब से जो भी बन सकता हो करवाने में सहयोग अवश्य प्रदान करेंगे।

Print Friendly, PDF & Email
Share