श्री राधाकृष्ण बहुगुणा जी को अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि

प्रस्तुति: हर्ष मणि बहुगुणा, 
*आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य ।*
*आश्चर्यवच्चैनमन्य: श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ।।*
“‘ *परमात्मा के विधान को कौन समझेगा , उसी की माया से मोहित हम अपने स्वार्थ को सर्वोपरि मानते हैं , अन्यथा कौन यह कह सकता है कि जिस मानव ने प्रात: अपने पुत्र के साथ लगभग एक घंटे तक बात की वह विभूति श्री राधाकृष्ण बहुगुणा श्याम आठ बजे सबको छोड़ कर अन्तिम यात्रा के लिए अपने सगे संबंधियों ,पत्नी श्रीमती अनीता बहुगुणा व भाई श्री हरि प्रसाद बहुगुणा जी को व अन्य लोगों को अलविदा कह कर शान्त व निर्विकार भाव से चलने के लिए बिवश हो गया या इतना ही जीवन था उस महामानव का, कुछ ज्ञात नहीं है । संसार में जो आया है वह अवश्य जाएगा , यह अटल सत्य है और हम सदैव जीवित रहने के लिए प्रार्थना करते हैं यह विडम्बना है । इसी का नाम मोह है । कैसे हुआ यह जानना कठिन है पर सायं चार बजे के करीब घबराहट के कारण अपनी सहधर्मिणी श्रीमती अनीता बहुगुणा व भाई श्री हरि प्रसाद बहुगुणा जी के साथ मसीहा अस्पताल के लिए स्वस्थ होने गये किन्तु रात आठ बजे पार्थिव शरीर के साथ घर लौटे । शायद हृदयाघात जिसका किसी को भी ज्ञान नहीं हो सका , इस लोक से जाने का कारण बना । ईश्वर इच्छा बलवती होने से यह सब हुआ अब सोचने का यही एक मात्र सहारा है या मन को सान्त्वना देने का माध्यम है ।* “‘
*जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।*
*तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ।।*
“‘ *असह्य वेदना कुछ कहने की हिम्मत नहीं फिर भी यह सब सहा व सहते रहेंगे और श्रृद्धाञ्जलि के लिए दो शब्द कहने की सामर्थ्य जुटा रहा हूं । आपने इस देवभूमि उत्तराखंड , सावली गांव की माटी में ०५ अक्टूबर सन् १९५९ में पण्डित स्व० श्री दिल मणि बहुगुणा जी के घर में तृतीय सुपुत्र के रुप में अवतरित होकर इस धरा को पवित्र किया । जीवन मंत्र जीने के लिए अनेक सुकर्म कर इण्टर स्तर की शिक्षा प्राप्त कर आजीविका की तलाश की । ‘होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ ‘ नौकरी की कहीं कमी नहीं थी । आप तो रामलीला के सुपात्र थे , मधुर कण्ठ के धनी हर तरह की कलाओं के मर्मज्ञ फिर भी सी आर पी एफ (c r p f) की भर्ती पंक्ति में खड़े हो गए और सब कुछ चौकस होने के बाद भर्ती हो गए । सुयोग्य वक्ता, उत्कृष्ट लेखक एवं अच्छे लेख के कारण अधिकारियों की प्रशंसा के पात्र बने व लगभग पैंतीस वर्ष तक सेवा दान कर s i के पद से ३१ अक्टूबर सन् २०१६ को सेवा निवृत्त होकर घर आएं तब क्या पता था कि इतनी जल्दी आपका जीवन व व्यक्तित्व हम सबसे अलग हो जाएगा । विपत्तियां मानव जीवन का एक अंग हैं। शायद आपके जीवन में भी कम उतार चढाव न आए हों, यह ज्ञात नहीं है । पर जब आप मात्र आठ नौ साल के थे तब जनवरी सन् १९६८ को पिताश्री प्रात: स्मरणीय हो गये थे । क्या हृदय विदारक दृश्य था , दोनों बेटियां श्रीमती सुधा तीन वर्ष की व श्रीमती प्रेमा जो मात्र छः महीने की थी किसके भरोसे थी ( वह दृश्य आज भी आंखों के सम्मुख स्पष्ट दिखाई दे रहा है) तो फिर संघर्ष होना स्वाभाविक ही था । बड़े भाई श्री पुष्प राज बहुगुणा जी जिनका जन्म २८ दिसम्बर सन् १९५३ को हुआ वह भी अचानक असमय २०-११-१९९१ को हृदयाघात से इस नश्वर शरीर को छोड़कर स्वर्ग सिधार गए, उनकी दो बेटियां व सहधर्मिणी श्रीमती सुधा बहुगुणा को कितनी विपत्तियां झेलनी पड़ी होंगी उन्हीं की आत्मा जान सकती है ,उस असीम वेदना को सहन न कर पाने के कारण माताश्री भी इस संसार को अलविदा कह कर चली गई जिन्होंने बड़े कष्टों से आप लोगों का पालन पोषण किया। कितनी विपत्तियां आई, आप सबने सहन की , अब जब कुछ सुख की अनुभूति होती तो आपने उसे भी तिलाञ्जलि देकर अपना मार्ग स्वयं चुना । आपकी धर्म पत्नी का तो रो- रो कर बुरा हाल है । बस यही कह रही हैं व सोच रही हैं । –* कि –
*कसमें वादे प्यार वफ़ा, बातें हैं, बातों का क्या ?*
*कोई किसी का नहीं ये झूठे, नाते हैं, नातों का क्या ?*
” *भाई हरि प्रसाद बहुगुणा जी जो आपसे मात्र दो-ढाई साल बड़े हैं कठिनाई से अपने मन के उद्गारों को रोक पा रहे हैं अपने दो सुपुत्रों श्री नवीन बहुगुणा व शैलेन्द्र बहुगुणा व विवाहिता बेटी श्रीमती माधुरी को तत्काल घर बुलाया कहा यह मर्मान्तक पीड़ा असहनीय है कुछ सहारा चाहिए, उनकी सहधर्मिणी भी इस असह्य वेदना को सहन नहीं कर पा रही हैं ।पर विधि के विधान के आगे हमारा कोई वश नहीं चल सकता । बड़ी भाभी भी अपनी दोनों बेटियों सहित इस वेदना को सहन करने रोती-बिलखती उल्टे पांव घर आईं । अपरिहार्य इस वेदना को सहन करना ही पड़ेगा ।* “
‘ *धन्य है ऐसी आत्मा के लिए , दो बेटियां दोनों विवाहित एक श्रीमती पूनम इंगलैंड में है वहीं रो रोकर यह महसूस कर रही है कि पिता के अन्तिम दर्शन भी नहीं कर पाई, तो दूसरी श्रीमती रश्मि देहरादून से तत्काल आकर पिताजी के पार्थिव शरीर से चिपट गई। सुपुत्र अजय बहुगुणा उड़ीसा से पिता श्री की अन्तिम यात्रा की रस्म पूरी करने पहुंच गया , इससे अधिक कोई करता भी तो क्या ? परन्तु यह भवितव्यता थी या इस वंश की अच्छाईयां, आपके परिवार का यदि मूल्यांकन किया जाय तो यह ज्ञात होता है कि आपके दादा जी स्व० श्री गोकुलानंद जी सुपुत्र स्व० श्री पाती राम बहुगुणा जी के तीन सुपुत्रों में सबसे बड़े पुत्र थे जिनके (श्री गोकुलानंद बहुगुणा जी) चार सुपुत्रों में सबसे बड़े सुपुत्र स्व० श्री श्याम लाल बहुगुणा जी, जिनका निधन सन् १९७२ में हुआ, दूसरे सुपुत्र स्व० श्री ज्ञान देव बहुगुणा जी तीसरे सुपुत्र स्व० श्री दिल मणि बहुगुणा जी व चौथे सुपुत्र स्व० श्री गलपी राम बहुगुणा जी की तो वंश वृद्धि नहीं हुई व ज्ञान देव जी उनियाल गांव में विस्थापित हो गये आज उनके सुपुत्र स्व० श्री अमर देव बहुगुणा जी भी नहीं है उनके दो सुपुत्र अपना जीवन सुखमय यापन कर रहे हैं । बड़े भाई श्री श्याम लाल बहुगुणा जी व आपके पिताजी श्री दिल मणि बहुगुणा जी जब तक जीवित रहे तब तक इकट्ठे रहे । दोनों भाईयों के जाने के बाद ही बड़े भाई जी के एक मात्र सुपुत्र स्व० श्री इन्द्र दत्त बहुगुणा जी जो अक्टूबर सन् २००२ में लगभग ५८ वर्ष की अवस्था में दिवंगत हो गये थे , ने आपस में प्रीति बनी रहे , इस विश्वास से आपको अलग -अलग हिस्से दिए , यही मानवता आपकी रग – रग में भरी थी । यह भी सत्य ही है कि अप्रिय होते हुए हितकारी वाणी बोलने वाले व सुनने वाले व्यक्ति दुर्लभ होते हैं* “‘
*सुलभा: पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिन: ।*
*अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ: ।।*
“‘ *यही विशेषता है इस माटी की, व इस वंश की। यहां का गुण है कि कोई भी व्यक्ति अगर कुमार्ग गामी बन रहा है तो उसे सन्मार्ग की ओर प्रेरित करने का प्रयास किया जाता है इस लिए कभी कभी अप्रिय सत्य भी बोलना पड़ता है , और बोलना भी चाहिए। यहां के गुण ग्राही मानव इस तथ्य को स्वीकार भी करते हैं व तदनुरूप चलते भी है । अहंकार रहित मानव ही ऐसा कर सकता है । आज आपको सभी ग्राम वासी श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं , कोटि-कोटि नमन करते हुए भावभीनी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि भी अर्पित करते हैं तथा आपकी आत्मा को शान्ति मिले यह प्रार्थना भी करता है और यह कामना भी करता हैं कि इस असह्य वेदना को सहन करने की शक्ति परिवार जनों को प्राप्त हो प्रार्थना ही की जा सकती है जबकि हम सब यह भी जानते हैं कि आत्मा अजर व अमर है ।* “‘
*न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूय: ।*
*अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।।*
*सुख सपना दु:ख बुदबुदा दोनों ही मेहमान ।*
*इनका आदर कीजिए जो भेजे भगवान ।।*

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