कोटी कॉलोनी कीर्तिनगर व मुनिकीरेती में चलाया गया सफाई एवं जागरूकता  अभियान 

नई टिहरी:  अंतराष्ट्रीय वेटलैंड डे के अवसर पर कोटी कॉलोनी, कीर्तिनगर व मुनिकीरेती में सफाई एवं जागरूकता अभियान चलाया गया। यह जानकारी देते हुए डीईओ टिहरी वन प्रभाग कोको रोसे ने बताया कि पर्यावरण में वेटलैंड एक ऐसी व्यवस्था है, जो धरती पर जलस्रोतों, पेड़–पौधों और जीव-जन्तुओं के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है तथा हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का एक बहुत जरूरी घटक भी है। पर्यावरण को बचाने के लिये जरूरी है कि हम अपने प्राकृतिक वेटलैंड को बचाएँ और सहेजें। वेटलैंड को सहेजने से ही हम पानी और परिन्दों को भी सहेज पाएँगे।

Cleanliness and vigorous campaign was conducted in Koti Colony Kirtinagar and Munikireti

उन्होंने कहा कि जैव विविधता के लिये तो वेटलैंड किसी वरदान की तरह है और प्रवासी पक्षियों के लिये भी ये उनकी पसन्दीदा सैरगाह या आश्रय स्थल की तरह होते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वेटलैंड सहेजने के जरिए हम प्रकृति को ही सहेजने की बात करते हैं। अच्छी बात यह है कि अब इसकी तरफ लोगों का ध्यान भी तेजी से जा रहा है और कई जगह इस दिशा में अच्छे काम की शुरुआत भी हुई है।

वेटलैंड एरिया या आर्द्रभूमि क्षेत्र उस जगह को कहा जा सकता है, जो अस्थायी या स्थायी रूप से पानी से भरी रहे और धीरे–धीरे वह अपना खुद का एक स्वतंत्र पर्यावरणीय तंत्र विकसित कर लेता है। कहा कि बरसात के दिनों में ये वेटलैंड बरसाती पानी को व्यर्थ बह जाने से रोकते हैं और करोड़ो गैलन पानी को सहेजते हैं। ये पानी को धरती की रगों तक रिसाने तथा इसके जरिए भूजल भण्डार को बढ़ाने में अपना अहम योगदान भी करते हैं। इनके महत्त्व को देखते हुए कुछ स्थानों पर कृत्रिम रूप से भी इन्हें बनाया जाता है। हमारी नदियों, जलस्रोतों और भूजल भण्डारों की तरह ही वेटलैंड या आमि भी धरती पर पानी के जलीय चक्र का अभिन्न हिस्सा है। ये भूजल को रिचार्ज करते हैं। इनमें पानी भरे होने तथा पानी से सन्तृप्त होने के कारण इससे आसपास के जलस्रोतों को भी बड़ी मदद मिलती है। वे ज्यादा समय तक पानी दे पाते हैं और एक हद तक जलवायु परिवर्तन में भी मदद करते हैं।

जैव विविधता को समृद्ध करने में भी इनका बड़ा योगदान है। झीलों में जलीय और उसके आसपास दलदली जमीन में विभिन्न प्रकार के जीव–जन्तु तथा पेड़–पौधे का भी प्राकृतिक आवास होता है या वे यहाँ आश्रय लेते हैं। वहीं ठंडे देशों से हर साल ठंड के मौसम में बड़ी संख्या में प्रवासी परिन्दे भी अपनी गुजर–बसर के लिये अन्य देशों के इन्ही वेटलैंड में शरण लेते हैं। डीएफओ ने बताया कि एक तरफ जहाँ जैव विविधता खतरे में है, जीव–जन्तुओं और पेड़–पौधों की कई प्रजातियाँ खत्म होने की कगार पर हैं, ऐसे समय में वेटलैंड की जरूरत साफ तौर पर समझी जा सकती है।

इसी महत्त्व के मद्देनजर 1971 में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर रामसर सम्मेलन में इन्हें सहेजने की तरफ सबसे पहले ध्यान केन्द्रित किया गया।

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