श्री रामेश्वर प्रसाद बहुगुणा जिन्होंने देवभूमि की इस धरा को उपकृत कर मानव जीवन का बहुमूल्य पाठ भी पढ़ाया

श्री रामेश्वर प्रसाद बहुगुणा

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा,

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।।

आज नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती के पावन पर्व की मधुरिम वेला पर सावली गांव में ज्योतिष के परम प्रकाण्ड विद्वान प्रात: स्मरणीय स्व० श्री तारा नन्द बहुगुणा जी के बड़े सुपुत्र प्रात: स्मरणीय श्री रामेश्वर प्रसाद बहुगुणा जी ने इस गांव की प्रतिष्ठा को बढ़ाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देकर हम सब पर उपकार ही नहीं किया, अपितु देवभूमि की इस धरा को भी उपकृत कर मानव जीवन का बहुमूल्य पाठ भी पढ़ाया।

आज जब मानव, जीवन के अन्तिम स्वर्णिम क्षणों को घर परिवार की परिक्रमा करते हुए गवां देता है, तब आप जैसी विभूतियां अनुपम सन्देश देकर इस धरा धाम को स्वर्ग से भी ऊंचा स्थान प्रदान कर अपना जीवन व परलोक दोनों को सुधारते हैं। धन्य हैं वे माता पिता और धन्य है आपकी जन्म भूमि। दस अगस्त सन् १९२८ को आपका आविर्भाव इस गांव में हुआ।

अलीगढ़ विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर परीक्षा के साथ बी एड तथा साहित्य रत्न की उपाधि प्राप्त की। १९५४/५५ में व्यक्तिगत हाई स्कूल चम्बा जो आज श्री देव सुमन इण्टर कॉलेज के रूप में जाना जाता है, तब व्यक्तिगत रूप से संचालित होता था में शिक्षण कार्य किया।

यहां के साधन विहीन क्षेत्र की सेवा करने की इच्छा रखते हुए भी ईश्वर इच्छा को बलवती मानते हुए भारत की राजधानी दिल्ली में प्रस्थान किया व वहां के राजकीय विद्यालय में स्नातक वेतन क्रम में अध्यापक बन कर सेवा कर्म में प्रवेश किया। गणित व अंग्रेजी के कुशल शिक्षकों में आपकी गिनती की जाती थी, निस्वार्थ भाव से सेवा आपके जीवन का लक्ष्य था। जिसकी जो आवश्यकता होती थी उसकी पूर्ति भगवान ने आपके माध्यम से करवाई।

आपको निकट से देखने व जानने का सफल मौका तब मिला जब मैं दिल्ली से बी, एड कर रहा था। कब संयोग बनते हैं  या बिगड़ते हैं कुछ कहते नहीं बनता है। सहिष्णुता की प्रति मूर्ति थे आप, आपकी सहधर्मिणी भी तो आपकी अनुयायी ही थी। उस द्वार से शायद ही कोई खाली हाथ गया होगा।

१९७८ से १९८५ तक स्नातकोत्तर वेतन क्रम में उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में कार्यरत रहते हुए सेवा निवृत्त हुए । दिल्ली से मुद्रित बाडूली मासिक पत्रिका का संपादन भी किया, जो गढ़वाली व कुमाऊनी लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय पत्रिका रही।

दुर्भाग्य था कि आपका एक मात्र सुयोग्य सुपुत्र श्री दिनेश १९८६/८७ में कभी न लौटने के लिए अस्ताचल की ओर अग्रसर हो गया इस हृदय विदारक घटना के बाद आपके जीवन में उतार चढाव होते रहे। सुपुत्री इन्दिरा विवाहोपरान्त कानपुर में अपने घर परिवार के दायित्व को कुशलता के साथ पूरा कर रही है। घर गांव में छोटे भाई हरिवंश बहुगुणा जी की असामयिक मृत्यु, क्या जीवन था, क्या विद्वत्ता थी। शायद विदुर की यह उक्ति आप पर खरी प्रतीत होती है। –

 क्षिप्रं विजानाति चिरं श्रृणोति, विज्ञाय चार्थं भजते न कामात्,

नाहम्पृष्टो व्युपयुङ्क्ते परार्थे, तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य।।

भाई की असामयिक मृत्यु शरीर को तो क्या पीड़ा देने वाली होती पर मन को जो आघात लगा वह किसी भी तरह भूलाया जाना संभव नहीं था पर आपकी सहन शक्ति अनुकरणीय है। उनके असहाय मासूम बच्चों व रोती-बिलखती सहधर्मिणी को सम्वल व सहारा देकर आपने अपने दायित्व एवं कर्त्तव्य का सुपरिचय दिया। ( तीनों सुपुत्र श्री विवेकानंद जो आज वरिष्ठ प्रशाशनिक अधिकारी के पद पर शिक्षा विभाग की शोभा बढ़ा रहे हैं। दूसरे सुपुत्र श्री भवानी बहुगुणा उच्च माध्यमिक विद्यालय (केन्द्रीय ) दिल्ली में अंग्रेजी के प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हैं। तीसरे सुपुत्र श्री गोपाल बहुगुणा सुयोग्य व्यक्तित्व के धनी भारतीय जनता पार्टी के ईमानदार कार्यकर्ता, पतंजलि योगपीठ से सम्वद्ध  पतंजलि के उत्पादों का विक्रय रानीचौंरी में कर रहे हैं ।

बिटिया आयुष्मति लीला ससुराल कानपुर में अपने घर परिवार की गृहलक्ष्मी बन कर गरिमा पूर्ण जीवन यापन कर रही है। आप सबके उज्ज्वल भविष्य की शुभकामना।) पिताजी को बृद्धावस्था में दु:ख देखना था, असहनीय वेदना को सहन करते हुए और फिर उनका शरीर शान्त हो जाना!  सब कष्ट प्रद ही था। कभी कभी अत्यधिक वेदना होती है कि जिस मानव ने कभी भी मानवता का त्याग नहीं किया उसे इतना बड़ा कष्ट क्यों? प्रात: स्मरणीय तारा नन्द बहुगुणा जी ने कभी भी असहिष्णुता का परिचय नहीं दिया? सबको नि: शुल्क शिक्षा प्रदान की, अहंकार रहित, छल कपट से बहुत दूर फिर भी जीवन के अन्तिम तीन/चार साल अश्रुपूरित नेत्रों से व्यतीत हुए। यह थी विधि की संरचना जो हमें आगाह करती है कि यदि हम किसी का हित नहीं कर सकते हैं तो अहित कभी भी किसी भी रूप में न करें। हर योग्य व्यक्ति पर इस तरह की विपत्तियां आ ही जाती है। शायद पूर्व जन्म के पापों का प्रायश्चित करने का तरीका निकालने का मार्ग ऐसा हो। – शायद आप विज्ञ थे-

नवद्वारमिदं वेश्म त्रिस्थूणं पंचसाक्षिकम् ।

क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं विद्वान् यो वेद स पर: कवि:।।

फिर भी जीवन की गाड़ी चल ही रही थी कि २००१ में सहधर्मिणी का आकस्मिक चला जाना आपके जीवन में नया मोड़ ले कर आया और सन् २००२ में आपने चौथे आश्रम में जाने से पहले ही सन्यास लेकर स्वामी रामेश्वरानन्द के रूप में अपनी पहचान बनाई व मानव चेतना केन्द्र ऋषिकेश को अपनी साधना का केन्द्र बनाया और उसी आश्रम में २४ फरवरी २०१८ को अन्तिम स्वास लेकर इस धरा धाम से सदा सदा के लिए विदा लेते हुए प्रस्थान किया । आश्रम में रहने वालों ने अपना कर्त्तव्य पूरा करने में कोई कमी नहीं रखी।

परमगति की कामना के लिए श्रीमद्भागवत पुराण कथा का आयोजन किया । सन्यास लेकर आपने अपनी उच्चतम शिक्षा ग्रहण करने की, जो गरिमा थी उसे भी पूरा किया व अपने पूर्वजों के उद्धार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ऐसी दिवंगत विभूति को यह जन अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि समर्पित करते हुए अपने श्रद्धासुमन एवं श्रद्धांजलि अर्पित करने का प्रयास कर रहा है साथ ही कोटि-कोटि नमन करते हुए ऐसी दिवंगत विभूति से,-  सब के सन्मार्ग पर चलने की सद्बुद्धि  प्रदान करने की प्रार्थना करता है।

सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।।

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