श्री कुन्दन सिंह सज्वाण जो सामाजिक कार्यों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते रहे

Shri Kundan Singh Sajwan

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा,

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।

य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय: ।।

 आज नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती के पावन दिवस के सुअवसर पर दिनांक १६ जनवरी सन् २०२१ को जिन महापुरुष ने अपना पंचभौतिक शरीर छोड़ा, जो अपने क्षेत्र में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण देश की महान् आत्माओं द्वारा वन्दनीय रहे और ३१-०३-१९९१ को a /o /c / ए,ओ,सी में सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हो कर अपने पुरुषार्थ से अपने गांव में अपने परिवार व बच्चों के साथ जीवन यापन करने के लिए मन से तैयार हो कर, घर परिवार के साथ रहने लगे,  ऐसे प्रात: स्मरणीय श्री कुन्दन सिंह सज्वाण जी ने स्व० श्री अनूप सिंह सज्वाण जी के घर पन्द्रह अगस्त सन् १९४१ को, तब क्या पता था कि यही दिन स्वतंत्रता दिवस के रूप में भी मनाया जाएगा,- वहां,  जहां स्वतंत्रता-संग्राम सेनानियों- में श्री धूम सिंह सज्वाण व उनके सुपुत्र स्व० श्री उमराव सिंह सज्वाण जी ने जिस पवित्र गुल्ड़ी  गांव की माटी को पवित्र किया, (वहीं थी – आपकी जन्म स्थली), आपने भी चम्बा के निकट उसी मनियार पट्टी को विभूषित किया।

तब चम्बा में एक मात्र हाई स्कूल था वहां आपकी शिक्षा-दीक्षा हुई। हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद रोजी-रोटी जो उस समय की मूल भूत / प्राथमिक आवश्यकता थी की ओर अग्रसर हो कर २२-५-१९६३ को भारतीय सेना में शामिल हुए, व २८ वर्ष की अविरल सेवा के बाद तीस साल तक गांव के सम्मानित व्यक्तियों में अग्रगण्य रहे व सामाजिक कार्यों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते रहे ।

आपके दो चाचाश्री, एक तो दिवंगत हो गये, वे स्वनाम धन्य स्व० श्री श्याम सिंह सज्वाण व दूसरे श्री गम्भीर सिंह सज्वाण आज भी सानन्द सुख मय जीवन के आनंद का उपभोग कर रहे हैं। आपके जीवन के स्वर्णिम क्षण आपको खुशियां मनाने के लिए महत्वपूर्ण थे, आपकी सुलक्षणा सहधर्मिणी श्रीमती ने आपको भारतीय सेना में शामिल होने पर हार्दिक बधाई प्रेषित की व सन् १९६५ में दिनेश जैसे सुपुत्र को उपहार के रूप में प्रदान किया, किन्तु विधि के विधान को कौन मिटा सकता है, वर्ष १९९९ आपके लिए क्रूरता को लेकर आया जिस वर्ष आपने १९७२ में जन्मे परमजीत सज्वाण को तीस जनवरी व दिनेश सज्वाण को २६ दिसम्बर सन् १९९९ को अपने ही सम्मुख अपने लाडलों का शरीर शान्त होते देखा न परमजीत (जो वास्तव में परमवीर था) रहा व दिनेश भी सदा के लिए अस्त हो गया। आपके परिवार पर व आप पर क्या विपत्ति का पहाड़ टूटा होगा, क्या पैनी कटार चली होगी इस पीड़ा/वेदना को महसूस आप व आपके परिवार ने ही किया व सहन भी आप लोगों ने ही किया और शक्ति उस परमात्मा ने ही प्रदान की । आपकी सहन शक्ति व धैर्य को शत – शत नमन।  यह आपकी कुलीनता भी है ।

दुष्कुलीन: कुलीनो वा मर्यादां यो न लंघयेत् । धर्मापेक्षी मृदुर्ह्रीमान् स कुलीनशताद् वर: ।।

आपकी सौजन्यता एवं उदारता का ही परिणाम है कि आपके यहां सन् १९६८ में श्री त्रिलोक सिंह सज्वाण ने जन्म लेकर सुशिक्षा एवं सुसंस्कारों से आपकी कीर्ति को चारों दिशाओं में फहराने का प्रयास करते हुए शिक्षण के गुरु तर दायित्व का भार स्वीकार किया व उसका निर्वहन भी बखूबी कर रहे हैं और एक सुयोग्य व ईमानदार व्यक्तित्व के धनी व  कर्मठ शिक्षक हैं ।

सन् १९७० में वीना के रूप में एक लक्ष्मी ने जन्म लिया आज सुशिक्षा के बाद रमोला परिवार के गौरव को बढ़ा रही है उनकी अपनी सुपुत्री जो पुलिस विभाग में सब इंस्पेक्टर के दायित्व का निर्वहन कर रही हैं को भी जन्म देकर अब भण्डारी परिवार की गृहलक्ष्मी के रूप में वहां की गरिमा भी बढ़ा रही हैं , यह सब आपके पुण्यों का परिणाम है ।

सन् १९७७ में धर्म सिंह सज्वाण जी ने जन्म लेकर आपके पद चिन्हों पर चलने का मन बनाया व ३१ दिसम्बर सन् २०२० में सेना से सेवानिवृत्त हो कर पन्द्रह/ सोलह दिनों तक लगातार आपकी सेवा करने का लाभ अर्जित भी किया।   सेवा का मौका सबको मिला अपने अपने कार्य में रत रहते हुए पिता श्री को अपनी सेवा देकर  स्वयं को लाभान्वित किया,  हर व्यक्ति परमात्मा का अंश है, यही सच्ची मानवता है व सेवा धर्म है । आपके परिवार से यह पाठ पढ़ कर स्वयं को अभिभूत महसूस कर रहा हूं।

धन्य है आपका जीवन व धन्य है आपकी सहधर्मिणी जिनका जीवन इतना पवित्र व सेवा भाव से भरा है, जिसका परिणाम आज प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है। एसे आपके परिवार के सदस्यों के लिए मेरी शुभकामनाएं हैं व उनके उज्जवल भविष्य की शुभकामना करते हुए आपकी आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना करता हूं तथा सभी दिवंगत विभूतियों को कोटि-कोटि नमन करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपने श्रद्धासुमन समर्पित करता हूं। यह आपके पुनीत गांव की महत्ता भी है, जहां सभी सेवा धर्मी सु-जनों का निवास है ।

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्ग: कर्मसञ्ज्ञित: ।।

(ब्रह्म परम अक्षर है, जीवात्मा अध्यात्म नाम से कहा जाता है, भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला त्याग कर्म नाम से कहा गया है।)

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