श्री गणेश दत्त बहुगुणा जिन्होंने ब्राह्मणों के व्यवसाय से इतर आजीविका का साधन वाणिज्य को अपनाया

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा, 

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन: ।।
“क्या विशेषता है गीता की, ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब हमारे विषयक ही जानकारी दे रखी है । परब्रह्म परमात्मा जो सर्व व्यापी अनन्त चेतन में एकीभाव से स्थितरूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सबमें समभाव से देखने वाला योगी – आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण प्राणियों को आत्मा में कल्पित देखता है । आज ऐसे ही महामना मनीषी जिनके विषयक जानने की उत्कट अभिलाषा थी, सुबह श्याम जो हृदय पटल पर आच्छादित से रहते हैं । ऐसे महामानव जो कर्मकाण्ड के मर्मज्ञ, ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान , निर्णय के सागर व ब्राह्मणों के व्यवसाय से इतर आजीविका का साधन जिन्होंने वाणिज्य को अपनाया, किन्तु अपने धर्म के अनुरूप सदैव कर्म किया , उन प्रात: स्मरणीय श्री गणेश दत्त बहुगुणा जी को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करने का यथा सम्भव प्रयास कर उन्हें स्मरण कर कोटि-कोटि प्रणाम व श्रृद्धासुमन समर्पण के साथ भावाञ्जलि सप्रेम सादर अर्पित । आपके व्यक्तित्व से प्रभावित यह जन सदैव आपको अपना आदर्श मानता रहा है क्योंकि —* “‘
*सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषास्त्रय: ।*
*शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम् ।।*
“‘ *आपके यश को समझने का स्वर्णिम अवसर तब मिला जब काफी समय पूर्व जब किसी गांव में एक संकट सा आ गया था , यद्यपि संकट नहीं था पर मानव निर्मित अनिच्छित व्यवधान उत्पन्न हो गया था , गांव में या एक ही परिवार में कोई मांगलिक कार्य था, असमय किसी का निधन होने से धर्म संकट सा पैदा हो गया , उन्होंने क्या होना चाहिए ऐसी जिज्ञासा रख कर अनेक मनीषियों से उनकी सम्मति जाननी चाही , अधिकांश विद्वानों की राय थी तो एक पर नीति ढुलमुल ।

आप एक ऐसे निर्णायक थे कि आपने जो निर्णय दिया उसी पर अडिग रहे व उनसे कहा कि जब आपको अपनी इच्छानुसार ही कार्य करना है तो फिर इतना क्यों भटक रहे हो , होता यह है। शेष मर्जी आपकी जैसा उचित लगे वह करें । आपके ऐसे अन्य कई उदाहरण हैं जो सराहनीय तो है ही साथ ही मानवता का पाठ भी पढ़ाते हैं, धन्य हैं आप जिन्होंने २८ नवम्बर सन् १९१६ में पंडित यशोधरा नन्द बहुगुणा जी के घर को पवित्र किया जो पंडित बलदेव बहुगुणा जी के सुपुत्र थे । श्रीबलदेव जी खुण्या बहुगुणा जी के बड़े सुपुत्र थे आपके छोटे भाई श्री नन्द राम बहुगुणा जिनके कलि राम बहुगुणा जी व उनके सुपुत्र श्री राम प्रसाद बहुगुणा जी हुए । ये सभी दिवंगत विभूतियां स्व० श्री अजूबी बहुगुणा जी के तीन सुपुत्रों में बड़े श्री तुलसी जिनकी वंश वृद्धि नहीं हुई , दूसरे श्री तुला राम बहुगुणा जी जिनके सुपुत्र स्व० श्री हरि शरण बहुगुणा जी जिन्हें अपने श्रद्धासुमन अर्पित करने का सुअवसर प्राप्त हो गया था ।

आज उनके तृतीय सुपुत्र स्व० श्री खुण्या बहुगुणा जी के वंशजों को याद करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है ।आपकी सुशिक्षा वनारस संस्कृत महाविद्यालय से हुई , शास्त्री प्रथम वर्ष तक आपने औपचारिक रूप से शिक्षा अर्जित की , व्यावहारिक शिक्षा के लिए छोटी काशी तो थी ही । तब न नौकरी की चाहत थी , न व्यवसाय ढूंढने की आवश्यकता । फिर भी राज शाही में पंचायत सेवक (आज पंचायत मंत्री) के रूप में काम प्रारंभ किया पर दो वर्ष बाद ही नौकरी छोड़ दी । स्वाभिमानी व्यक्ति कभी भी दासता स्वीकार नहीं कर सकता है । आपकी रग रग में स्वाभिमान भरा था । अनावश्यक प्रशंसा करना आपके जीवन का ध्येय नहीं था । तब गांव में कोई दुकान नहीं थी अतः आप के द्वारा आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने के लिए एक छोटी सी दुकान आरम्भ की गई और जीवन पर्यन्त उस सेवा धर्म को बखूबी निभाया भी ।हमारे गांव के कुछ विभूति इसे एक आश्चर्य भी मानते थे । इस जन की दृष्टि में आप एक योगी थे , आपने कर्म को सर्वोपरि माना । भगवान श्री कृष्ण ने गीता में यही तो कहा –
*तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिक: ।
*कर्मिभ्यश्चाधिको योगी* *तस्माद्योगी भवार्जुन ।।
“‘ *जीवन में अनगिनत उतार चढाव आते हैं और चले जाते हैं , आपका जीवन भी अनेकों द्वन्द्वों से ओत-प्रोत रहा बड़ा सुपुत्र स्व० श्री बेणी प्रसाद बहुगुणा श्रीनगर से इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त कर जैसे ही (ongc) ओ यन जी सी में चयनित हुआ कि क्रूर काल के हाथों कैच होकर इस भवसागर / इस गांव की माटी से विदा हो गया । १९४४ में जन्मे स्व० श्री बेणी प्रसाद बहुगुणा ने मात्र २१ वर्ष तक के मानव जीवन का सफर तय किया और १९६५ में अपनी विदाई मांग कर परिवार को रोता बिलखता छोड़ कर चला गया । बड़ी बहिन का विवाह हो चुका था अब छोटे पुत्र श्री राधा कृष्ण बहुगुणा जी के कन्धों पर माता पिता के आंसुओं को पोंछने का गुरुत्तर दायित्व भी असमय ही आ गया , पर आप तो राधा कृष्ण की अप्रतिम मूर्ति के पोषक थे अतः उस दायित्व को पूरा करने में सफल रहे । आज आप अपनी मधुर वाणी से धार्मिक अनुष्ठानों का निर्वहन कर रहे हैं इसमें सुपुत्र श्री सत्यवीर का अच्छा सहयोग भी प्राप्त हो रहा है । दूसरे सुपुत्र श्री नित्यानंद बहुगुणा गृह कार्य में दक्ष जीवन यापन कर रहे हैं ।आपके इस सु परिवार को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ।* “”
*श्री गणेश दत्त बहुगुणा जी २१फरवरी सन् २०००में इस पवित्र गांव को अलविदा कह कर किसी दूसरे स्थान को पवित्र करने के लिए विदा हुए। ऐसी विभूति को सादर नमन ।

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