पहाड़ कू खाणू

  डा. दलीप सिंह बिष्ट

पहाड़ जन पैली थान, उना नी रैगी।
खाणू-लाणू यख, सब बदले गैगी।।
कौदैकी रोठी, अर भट्टू की चटणी।
वैकी जगा मोमो, अर सूपान लीली।।
झंगोरा का दगड़ी, पौळयों खाणू।
वैकी जगा चैमिन-मैगी ह्वेगी खाणू।।
कोदू-झंगोरु, सब्बी हरची गैगी।
वैकी जगा, फास्ट-फूडन लीली।।
छुटगी अब, पहाड़कू खाणू-लाणू।
घर-घर मा अब, चैमिन बन्याणू।।
पहाड़ कू खाणू-लाणू, सब हरची गैगी।
चैनिज खाणू, हर घरमा ह्वेगी।।
गौड़ा-भैसौकू दूध, कखी नी रैगी।
थैली कू दूध अब, गौं-गौं मा ह्वेगी।।
फास्ट-फूड मा, बडू मजा ओन्दु।
चट बणैक, अर फट खैये जान्दु।।
येकैं छन बुन्ना, आधुनिक खाणू।
इन गजब अब, पहाड़ मा भी ह्वाणू।।
पहाड़ जन पैली थान, उना नी रैगी।
खाणू-लाणू यख, सब बदले गैगी।।

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