पगडंडियां

                          डा. दलीप सिंह बिष्ट

पहाड़ और पगडंडियों का, अटूट रिश्ता।

एक के बिना दूसरे का, नही है अस्तित्व।।

पगडंडियां कही अब, खो सी गई है।

सड़कों का जाल सब, हजम कर गई है।।

गांव तक पहुंचने का, कभी पगडंडियां जरिया थी।

मोटर-गाडि़यों ने अब, उनका स्थान ले लिया है।।

राहगिरों की चहल कदमी, पगडियों की पहचान थी।

अब सूनी पड़ी पगडंडियां, शेष रह गई है।।

घास-पात की पगडंडियां, सूनसान हो गई़ है।

गांव के गांव यहां अब, खण्डर हो गये है।।

राहगिर ही कभी, पगडंडियों की शोभा थी।

अब बिना राहगिरों के, पगडंडियां अधूरी हैं।।

यही पगडंडियां कभी, गांव तक पहुंचाती थी।

सूने गांव और बंजर पगडंडियां, बाकी रह गई हैं।।

पगडंडियां पर चलते राहगिर, खूब बतयाते थे।

बाते करते-करते अपना, दुख-दर्द मिटाते थे।।

पगडंडियां अब वैसे ही, अकेली हो गई है।

जैसे बूढे मां-बाप, पहाड़ में पड़े रह गये है।।

पगडंडियां बस, स्मृतियों में शेष रह गई है।

सड़कों ने उन्हें मिटाकर, रख दिया है।।

गांव में आने-जाने की, शान थी पगडंडियां।

अब न नाम और न शान, बाकी बची रह गई है।।

समय के साथ सबने बदल दिया है, रंग-रुप अपना।

पगडंडियां धुधली है पर, आज भी वहीं खड़ी हैं।।

पगडंडियों पर चलना, कल की ही तो बात थी।

उन पर अब राहगिरों के, पदचाप शेष हैं।।

जिन पगडंडियों को, नापते हुए बडे हुए।

न वह पगडंडिया रही, और न वह कदम रहे।।

दौड़ते भागते, पगडंडियों पर जो निशान थे।

वह आज खुद-ब-खुद, मिटने लगे हैं।।

रह रहकर पगडंडियां, हमें बुला रही हैं।

वहां जाने को हमारे, कदम डगमगा रहे हैं।।

क्या दिन थे जिन, पगडंडियों पर दौड़ा करते थे।

बस अब उनकी स्मृतियां, मात्र शेष बची है।।

पहाड़ और पगडंडियों का, अटूट है रिश्ता।

एक के बिना दूसरे का, नही है अस्तित्व।।

 

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