नेताजी सुभाष चंद्र बोस : क्रांतिकारी व्यक्तित्व

                       पराक्रम दिवस’ पर विशे                     

  डा. प्रवीन जोशी 

‘पराक्रम दिवस’ पर भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के वास्तविक नायकों आदरणीय मंगल पांडेय, सुभाष चंद्र बोस “नेताजी”, चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव सहित अनेक लाखों अमर वीर सपूतों को नमन है जिनके बलिदान के बिना स्वतंत्रता मिलना असम्भव था | सिर्फ अहिंसा के डर से ही क्रूर, निर्दयी अंग्रजों ने भारत छोडा ये पूर्णत: असत्य है, वास्तव में ब्रिटिश प्रशासन से भारत को आजादी देने में जितनी भूमिका नरम दल की थी उससे कई गुना भूमिका राष्ट्रवाद की भावना से भरे गरम दल के क्रांतिकारियों की थी | यद्पि एक विशेष मानसिकता से ग्रसित पूर्ववर्ती चाटुकार इतिहास कारों द्वारा आज तक लोगों के सामने जो भी प्रायोजित इतिहास परोसा गया उसमे ऐसे वीर सपूतों के योगदान को हमेशा कम आँका गया | 

23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में जन्मे तथा कलकत्ता से प्रारंभिक शिक्षा के पश्चात् 22 सितम्बर 1920 भारतीय प्रशासनिक सेवा (इण्डियन सिविल सर्विस) में चयनित होने वाले पहले भारतीय ‘सुभाष चंद्र बोस’ भी ऐसे ही क्रांतिकारी नेता थे, जिनके बलिदान को हमेशा प्रमुखता प्रदान की जानी चाहिए | ‘राष्ट्र’ को अपनी जन्म देने वाली माँ से भी बढ़कर श्रेष्ठ मानने वाले सच्चे देशभक्त सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेजों की नौकरी से सर्वोपरि ‘राष्ट्र धर्म’ को माना और राजनीति को अपना कर्म क्षेत्र बनाने के लिये 22 अप्रैल 1922 को भारतीय प्रशासनिक सेवा से त्याग पत्र दे दिया और देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने के निर्णय के साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक सक्रिय सदस्य और वर्ष 1938 और 1939 में पार्टी अध्यक्ष बनना स्वीकार किया ।

हालांकि गाँधी जी के विचारों से असहमत होने के कारण सुभाष चन्द्र बोस ने वर्ष 1940 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया और क्रांतिकारियों की फ़ौज तैयार की | उसी समय क्रांतिकारियों के भेष में राजनेता बने बहुत सारे लोग आजादी मिलने के बाद सत्ता और कुर्सी के बड़े-बड़े सपने देख रहे थे, लेकिन सुभाष चंद्र बोस एक राजनेता नहीं बल्कि सच्चे देशभक्त थे जिनके अन्दर राष्ट्रीय भावना इतनी जटिल थी कि अंग्रजों से लोहा लेने के लिये उन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध में भारत छोड़ने का फैसला किया और जर्मन में हिटलर से मुलाकात के बाद वे 1943 में सिंगापुर जाकर उन्होंने इण्डियन नेशनल आर्मी की कमान संभाली । जापान में बंदी भारतीयों को जेलों से छुड़ा कर वहां की सरकारों की सहायता से उन्होंने “आजाद हिन्द फौज” का गठन किया ।

द्वितीय विश्व युद्द के दौर में जब अधिकाश देशों पर ब्रिटेन की जीत हो चुकी थी और अंग्रेजों द्वारा भारत में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को भी पूरी तरह कुचल दिया गया था. उस कठिन दौर में भी 30 दिसंबर 1943 को आजाद हिंद फौज ने जापान की मदद से अंडमान-निकोबार पर कब्जा कर लिया जहाँ सुभाष चंद्र बोस ने पहली बार तिरंगा फहराया था. ब्रिटिश राज के रहते हुए भारत की पहली आजाद सरकार बनाने का साहस नेताजी जैसे क्रांतिकारी में ही हो सकता था, इस आजाद सरकार को कई देशों द्वारा मान्यता भी प्रदान की गई थी |

वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा यहां तिरंगा फहराने की 75वीं वर्षगांठ पर 30 दिसंबर 2018 में वहां जाकर नेताजी को श्रद्धा सुमन अर्पित कर अंडमान और निकोबार के तीन द्वीपों के रॉस द्वीप, नील द्वीप और हैवलॉक द्वीप का नाम बदलकर क्रमशः नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप, शहीद द्वीप और स्वराज द्वीप रखा जाना नेताजी एवं आजाद हिन्द फ़ौज के वीर सैनिकों को सच्ची श्रदांजलि है। 

भारत की आजादी के साथ ही सुभाष चन्द्र बोस का लगाव सामाजिक कार्यों में भी रहा, उन्होंने बंगाल में बाढ़ से घिरे हुए लोगों को भोजन, वस्त्र और उनको सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने का काम भी किये थे और समाज सेवा को नियमित रूप से सुचारू रखने के लिए उन्होंने कई ‘युवक दल’ भी बनाये | गाँधी जी से वैचारिक मतभेद होने पर भी सुभाष चंद्र बोस द्वारा सर्वप्रथम उन्हें “महात्मा” नाम से संबोधित करना उनके सहृदयी होने तथा बड़ो के प्रति सम्मान को प्रमाणित करता है | पराक्रम, शौर्य एवं वीरता के अमर सेनानी एवं श्रद्धा, विश्वास और सम्मान के सच्चे पात्र “नेताजी” की देशभक्ति, राष्ट्रवाद की भावना एवं आदर्श, आज भी हमें प्रेरणा देता है और आने वाली पीढ़ी को भी देश के लिए बलिदान देने की प्रेरणा देता रहेगा।

लेखक राजकीय पी.जी.कालेज कोटद्वार में इतिहास विभाग के विभाग प्रभारी हैं |

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