मुलक्या रिवाज

डा. दलीपसिंह बिष्ट
मुलक्या रिवाज कख, हरचीगै मेरा पहाडुकू।
बोली-भाषा, गीत-गाणा, नी सुणेदा आजकू।।
ऋतु बौडि़क औंदी पर, रिवाज कख हरची गैन।
घाम, बरखा सब्बी होंदी, पर लोग कख गैन।।
नी दिखेन्दी कखी अब, घुघती, हिलांस।
नी सुणेदी कखी, भौर-पंछियों की आवाज।।
बोली-भाषा हरची गै, गौंकू रिवाज।
खेळा-मेळा नी होंदा, बैख्या रिवाज।।
अपणा नी दिखेंदा, क्वी यख।
पराया ह्वेगी, सब्बी परदेशु जैक।।
घेन्दुड़ी, छेंटुली अब नी, चखोल्यों की टोली।
गोरू-बाछरू नी दिखेन्दा, अर बल्दू की जोड़ी।।
कुजाणी गौंकू रिवाज, कख हरची गैई।
मेरा पहाड़कैं न जाणी, कैकी नजर लगी गैई।।
कोदू-झंगोरू नी दिखेन्दु, काखड़ी-मुंगरी कख गैन।
पीजा-बर्गर, चैमिन खाणू, गौं-गौंमा ह्वे गैन।।
गाड-गदरा, डांडा-कांठा, सब्बी सुन्न ह्वेग्या।
मनखी नी दिखेन्दा क्वी, गौं बांजा पड़ग्या।।
नी बासदी कखी अब, घुघती-हिलांस।
नी दिखेन्दी कखी, पोथल्यु की डार।।
कखान देखण अब, हुक्का कुकरांदा बुढ्या।
गौं-खोळा सब्बी, सुन्न ह्वे गया।
मुलक्या रिवाज कख, हरचीगै मेरा पहाडुकू।
बोली-भाषा, गीत-गाणा, नी सुणेदा आजकू।।

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