आंदोलन तो एक बहाना है?   

डा. दलीपसिंह बिष्ट

पिछले 6-7 वर्षों से देश के अन्दर एक बहुत बड़ी चर्चा चल रही है कि कौन कितना असहिष्णु है और कितना सहिष्णु। यदि देश के अन्दर कोई भी घटना होती है तो सबसे पहले उसकी जाति, धर्म और क्षेत्र देखा जाता है जो कि देश में हो रही हत्या बलात्कार, अपहरण आदि घटनाओं के विरोध प्रदर्शनों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। हत्या, बलात्कार, अपहरण किस जाति और धर्म के व्यक्ति का हुआ और किस जातिधर्म के व्यक्ति ने किया है, उसी आधार पर विरोध प्रदर्शनों की रूपरेखा तैयार की जाती है और फिर उसी आधार पर देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो जाते हैं। यही नही इसमें यह भी देखने में आया है कि घटना वाले प्रदेश में किस पार्टी की सरकार है उसी के आधार पर विरोध भी शुरू होता है। हाथरस की घटना पर जो दल और व्यक्ति हाय तौबा मचा रहे थे वही दल और लोग राजस्थान की घटना पर  चुप थे और जो दल और व्यक्ति राजस्थान आदि की घटना पर हायतौवा मचा रहे थे वह हाथरस की घटना पर चुपी साधे थे। जबकि घटना कही भी और किसी के भी साथ हो उसमें जातिधर्म का प्रश्न कहां से जाता है यह सोचनीय और विचार करने वाली बात है? क्योंकि अपराध या अपराधी कोई भी हो उसका विरोध घटना के आधार पर होना चाहिए कि जातिधर्म के आधार पर। पिछले 6-7 वर्षों से यह भी देखने को मिल रहा है कि हर घटना को हिन्दुमुस्लिम, दलितसवर्ण बनाकर देश के अन्दर एक ऐसा माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि जिससे सरकार को दलित और मुस्लिम विरोधी साबित किया जा सके। 

इसको नागरिकता संशोधन अधिनियम तथा कृषि कानूनों से समझा जा सकता है। नागरिकता संशोधन अधिनियम से कुछ लोगों द्वारा यह भ्रम फैलाने का प्रयास किया गया कि इससे अल्पसंख्यकों की नागरिकता खत्म हो जायेगी और सरकार अल्पसंख्यकों को देश से बाहर निकालने के लिए इस कानून को लायी है। इसलिए सभी लोगों विशेषरूप से अल्पसंख्यकों को इसका विरोध करना चाहिए और उसी भ्रम और अफवाह के बाद शाहिनबाग में विरोध स्वरूप धरना प्रदर्शन शुरू किया गया।

नागरिकता संशोधन अधिनियम के नाम पर दिल्ली की व्यवस्था को बंधक बनाकर कई महीने तक सड़क पर कब्जा बनाये रखा। इस आंदोलन में जो विशेष बात देखने को आई है वह आंदोलन का सुविधा सम्पन्न होना रहा है। शायद ही इतने सुविधायें एवं पकवान घर में मिलते जितने शाहिनबाग आंदोलन में प्रतिदिन परोसे जाते थे। यही नही इस आंदोलन में छोटेछोटे बच्चे, महिलायें, बृद्धों को शामिल कर एक ढाल के रूप में भी इस्तेमाल किया गया। आज किसानों के आंदोलन में भी शाहिनबाग वाली रणनीति ही काम कर रही है जिसमें बच्चे, महिलायें एवं वृद्धों को आगे करके सुखसुविधाओं की सारी वस्तुएं उपलब्ध कराकर आंदोलन को लम्बा खीचने का भरसक प्रयास किया जा रहा है। किसानों के आंदोलन में भी शाहिनबाग वाला भ्रम फैलाकर गणतंत्र दिवस के मौके पर ऐसा माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है जिससे दुनिया में भारत और सरकार की बदनामी हो सके। इन दोनों आंदोलनों में एक जैसी समानता देखने को मिलती है।

समान नागरिकता अधिनियम के विरोध में खड़े किये शाहिनबाग आंदोलन में भी में आजादी के नारे से लेकर प्रधानमंत्री को अपशब्दों का प्रयोग किया गया और किसानों के आंदोलन में भी आजादी और खालिस्तान के नारे लग रहे हैं। यहां यह भी विचारणीय प्रश्न है कि इन आंदोलनों में जिस प्रकार की सुखसुविधायें आंदोलनकारियों को उपलब्ध कराई जा रही है वह पहले कभी भी आंदोलनों में देखने को नही मिलती थी। जिससे यह आंदोलन जरूरतमंदों का कम और सुविधा देने वालों का फाइवस्टार आंदोलन ज्यादा लगता है। अतः इस पर गौर करने की आवश्यकता है कि शाहिनबाग और किसानों के आंदोलन में इतना बड़ा फंड कहां से रहा है? और उसके पीछे का असली मकसद क्या है? क्योंकि यहां किसान आंदोलन के नाम पर किसानों का इस्तेमाल किया जा रहा है। 

इसके अलावा देश में हिन्दुओं की आस्था पर भी लगातार चोट की जा रही है कभी देवीदेवताओं का अपमान तो कभी चित्रों को तोड़ाफोड़ा जाना, तो कभी फिल्मों   धारावाहिकों के माध्यम से हिन्दुओं को गालीगालौच देने की संस्कृति भी एक फैशन का रूप धारण करती जा रही है। देश में किसी भी व्यक्ति, समाज, समुदाय की आस्था को ठेस पहुंचाना अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग ही नही, वरन् एक जघन्य अपराध भी है, जिसे किसी भी रूप में माफ नही किया जा सकता है। परन्तु जब इसका विरोध किया जाता है तो बात कभी हिन्दुमुस्लिम तो कभी बहुसंख्यकअल्पसंख्यक से होकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक पहुंच जाती है और यह अक्सर हिन्दुओं की आस्था के विषय में देखने को मिलती है। कश्मीरी लड़की के गाना गाने पर तो उसके खिलाफ फतवा जारी किया जाता है और कहा जाता है कि हमारा धर्म गाना गाने की अनुमति नही देता है इसमें अभिव्यक्ति की आजादी कही गायब हो जाती है।

फ्रांस में एक शिक्षक द्वारा एक धर्म विशेष के अराध्य का कार्टून बनाने मात्र से उस शिक्षक की हत्या तक कर दी जाती है और उसके खिलाफ कार्यवाही होने पर उसकी हत्या को जायज ठहराने के लिए दुनिया के साथसाथ भारत में भी फ्रांस के विरोध में उग्र प्रदर्शन किये जाते है यानि घटना फ्रांस में होती है और विरोध भारत में होने लगता है। तब अभिव्यक्ति की आजादी का भजन गाने वाले लोग संगठन कहीं नजर नही आते है। लेकिन जब हिन्दुओं की आस्था को तारतार किया जाता है तब अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इसे सही साबित करने का प्रयास किया जाता है। हिन्दु धर्म हमेशा सहिष्णु रहा है और इसी का फायदा उठाते हुए उसके देवीदेवताओं को बदनान करने का षड़यंत्र बहुत पहले से चला रहा है। जबकि इनका समर्थन करने के लिए कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी हर मौके पर चाहे शाहिनबाग हो या किसानों का आंदोलन या हिन्दु देवीदेवताओं को बदनाम करने का कार्य, सामने आकर उनके बचाब में कई प्रकार के कुतर्क देने से बाज नही आते हैं। 

इस देश का एक गृहमंत्री वोटों की फसल काटने के लिए भगवा आतंकवाद कहने से भी गुरेज नही करता है और ऐसा कहकर पूरी दुनिया में हिन्दुओं को बदनाम करने का दुसाहस करता है तो उन्हीं के पार्टी का एक मुख्यमंत्री रह चुका नेता मुम्बई आतंकी हमले को भगवा रंग से जोड़कर आतंकवादियों के कारनामों पर पर्दा डालने का काम करता है। जबकि विश्व में जहां भी आतंकवादी घटनायें हुई है या हो रही है उन सबके तार कहीं कही एक धर्म विशेष से जुड़े होते है तब यही लोग कहते नही थकते है कि आतंकवाद का कोई धर्म नही होता है फिर इनकी दृष्टि में आतकवाद का रंग भगवा कहां से जाता है, यह सोचने का विषय है? इससे साबित होता है कि हिन्दुओं को प्रताडि़त करना सहिष्णुता है और आतंकवाद से जिस धर्म का हर जगह कनेक्शन मिलता है उसका नाम लेना असहिष्णुता का प्रमाण है।

वास्तव में हिन्दु शांतिप्रिय एवं बसुधैव कुटम्बकम में विश्वास करता है और इसे हिन्दुओं की कमजोरी माना जाने लगा है। इसके साथ ही कुछ ताकतें इसके नाम पर देश को साम्प्रायिकता की आग में झोंककर दुनिया में बदनाम करना चाहते है। हम सबने देखा है कि पिछले कुछ समय से आंदोलनों का रंग रूप भी बदलता जा रहा है। आंदोलनों में जिस प्रकार बच्चों और बृद्धों को ढाल के रूप में प्रयोग किया जा रहा है तथा जिस प्रकार आंदोलनों में सभी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति मुफ्त में परोसी जा रही है वह तो कम से कम यही साबित करता है कि आंदोलन की आड़ में मंसा कुछ और ही है। अतः आज समय गया है कि जब सरकार से लेकर हम सबको गम्भीरता से सोचना होगा कि जो आंदोलन हम देश में अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे है उनमें बग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिग्यों के हितों की बात कहां से जाती है। यही नही मोदी के मरने, पाकिस्तान जिंदाबाद, खालिस्तान जिंदावाद, देशद्रोहियों की रिहाई की मांग जैसे मुद्दे कहां से जाते है? कुछ आसामाजिक तत्व की गिद्ध दृष्टि ऐसे आंदोलनों हर समय लगी रहती है जो कि इसकी आड़ में आंदोलकारियों के हितों को दरकिनार करके अपने हितों को आगे रखकर उनका इस्तेमाल करने लग जाते हैं। इसलिए आंदोलनकारियों को भी इनसे सतर्क रहने की आवश्यकता है और सरकार को भी इनके विरूद्ध कठोर कार्यवाही करनी चाहिए।

लेखक: वर्तमान समय में असिस्टेंट प्रोफेसरराजनीति विज्ञान, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग में कार्यरतहैं।

Print Friendly, PDF & Email
Share