अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हिन्दुओं की आस्था पर चोट

Dr. daleepSingh

प्रस्तुति: डॉ. दलीपसिंह बिष्ट 

देश में हिन्दुओं की आस्था पर लगातार चोट की जा रही है तथा देवी-देवताओं का अपमान, चित्रों को तोड़ा जाना एक फैशन सा बनता जा रहा है। फिल्मों से लेकर धारावाहिकों के माध्यम से हिन्दुओं को गाली-गालौच देना एक आम बात होती जा रही है। देश में किसी की भी आस्था को ठेस पहुंचाना आजादी का दुरुपयोग ही नही बल्कि एक जघन्य अपराध भी है, जिसे किसी भी तरह से माफ नही किया जा सकता है। जब ऐसे कार्यों का विरोध किया जाता है तो बात अल्पसंख्यकों से लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खत्म करने तक पहुंच जाती है।

इस प्रकार की गतिविधियां एक धर्म विशेष के खिलाफ षड़यंत्र के आलावा कुछ नही कहा जा सकता है। जबकि इनका समर्थन करने के लिए कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी सामने आकर सही साबित करने के लिए कई प्रकार के अधकंडे अपनाने लगते है। जिस देश का एक गृहमंत्री तक वोटों की फसल काटने के लिए भगवा आतंकवाद कहकर हिन्दु धर्म को दुनिया में बदनाम करने का दुसाहस करता है तो कोई मुम्बई आतंकी हमले को भी भगवा रंग से जोड़कर आतंकवादियों को बचाने का काम करता है। विश्व में आज जहां भी आतंकवाद की घटनायें हुई है या हो रही है उन सबके तार कहीं न कही एक धर्म विशेष से जुड़े होते है तब यही लोग यह कहते नही थकते है कि आतंकवाद का कोई धर्म नही होता है। इससे साबित हो जाता है कि हिन्दुओं को प्रताडि़त करना धर्मनिरपेक्षता है और आतंकवाद से जिस धर्म का सभी जगह कनेक्शन मिलता है उसका नाम लेना साम्प्रादिकता हो जाता है।

वास्तव में हिन्दुओं को गाली-गलौच करना धीरे-धीरे एक फैशन का रूप लेता जा जा रहा है, कुछ ताकते इसके नाम पर देश को साम्प्रायिकता की आग में झोंककर देश को दुनिया में बदनाम करना चाहते है। हम सबने देखा है कि पिछले कुछ समय से आंदोलनों का रंग रूप भी बदलता जा रहा है। आंदोलनों में जिस प्रकार बच्चों और बृद्धों को ढाल के रूप में प्रयोग किया जा रहा है तथा जिस प्रकार आंदोलनों में सभी आवश्यक चीजों की आपूर्ति हो रही है वह यही साबित करता है कि आंदोलन की आड़ मंसा कुछ और ही है जो शाहिनबाग में भी देखी गई थी।

शाहिनबाग के आंदोलन ने एक नई परिपाटी को जन्म दिया है जिसमें बिरियानी से लेकर विभिन्न प्रकार के पकवान लोगों को परोसे जा रहे थे और जमकर डांस पार्टी हो रही थी और वही स्थिति आज किसान आंदोलन में भी देखने को मिल रही है। इससे यह आंदोलन जरूरतमंद लोगों से आगे निकलकर किसी और के हाथों में चला गया है, जो कि समाधान की जगह आंदोलन को लम्बा खीचकर गणतंत्र दिवस में व्यवधान डालकर विश्व में देश की छबि खराब करना चाहते है।

शाहिनबाग एवं आज किसानों के आंदोलन में पाकिस्तान जिंदावाद, मोदी के मरने, आजादी और न जाने किस-किस तरह के नारे लगाये जा रहे है जो कि यही साबित करता है कि किसी भी प्रकार से देश को बदनाम किया जायं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि यह सरकार का विरोध कम और षडयंत्र ज्यादा लगता है तभी बहुसंख्यक हिन्दुओं के देवी-देवताओं की आस्था से खिलबाड़ किया जा रहा है और आंदोलनों में आंदोलनकारियों के हितों के बजाय बंग्लादेशी घुसपैठियों एवं रोहिग्यों के हितों की बात की जाती है।

अतः आज समय आ गया है कि जब हम सबको गम्भीरता से सोचना होगा कि जो आंदोलन हम अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे है उन पर आसामाजिक तत्व की गिद्ध दृष्टि लगी हुई है जो कि इसके आड़ अपने हितों की बात करने लगते हैं। इसलिए आंदोलनकारियों को भी इनसे सतर्क रहने की आवश्यकता है जिससे देश को इन असामाजिक तत्वों से बचाया जा सके और सरकार को भी इन पर कठोर कार्यवाही करनी चाहिए।

Print Friendly, PDF & Email
Share