भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद एवं स्वामी विवेकानंद

राष्ट्रीय युवा पखवाड़ा पर विशेष

प्रस्तुति: डा. प्रवीन जोशी,

प्राचीन भारतीय संस्कृति, परम्परा, वेदान्त, उपनिषद् और सनातन धर्म के महान प्रतीक स्वामी विवेकानंद जी ने दुनिया में भारत के आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और आत्मगौरव को बढ़ाया |

भारतीय संस्कृति, धर्म, परम्परा और इतिहास को विश्व पटल पर प्रतिष्ठित करने वाले स्वामी विवेकानन्द का  भारतीय संस्कृति के संदर्भ में मानना था कि वैदिक संस्कृति भारत की आत्मा है और यहाँ की आध्यामिकता भारत का मेरूदण्ड है”।   

स्वामी विवेकानन्द ने अपने ज्ञान, विवेक और आध्यात्मिक शक्ति से भारत के प्रति दुनिया का दृष्टिकोण ही बदल दिया | स्वामी जी के ‘शिकागो विश्व धर्म सम्मलेन’ एवं अन्य स्थानों ने दिए व्याख्यानों की वजह से पाश्चात्य जगत के लोग भारत को श्रद्धाभाव से देखने लगे | स्वामी जी ने भारत की संस्कृति, धर्म, ऐतिहासिक विरासतों और अध्यात्म से देश और दुनिया को परिचित कराया, जिसके कारण देशवासियों का आत्मगौरव बढ़ा और दुनिया भारत की महानता से परिचित हो पायी |

उन्होंने भारतीय जन-समुदाय के सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक परिस्थितियों को निकट से देखा तथा समझा था इसीलिए वे प्रत्येक भारत वासियों को भारतीय संस्कृति की प्राचीनता एवं महत्व को जानने और समझने के लिए सदैव प्रेरित करते रहे।

स्वामी जी मानते थे कि जब व्यक्ति  संस्कारवश अच्छे कार्य करता है तभी उसका चरित्र गठित होता है । वे कहते थे कि बुराईयों का कारण मनुष्य में ही निहित है, किसी दैवीय सत्ता में नही । मनुष्य रेशम के कीडे  के समान है वह अपने आप से ही सूत निकालकर कोष बना लेता है और फिर उसी में बंद हो जाता है । इस जाल को व्यक्ति स्वयं ही नष्ट कर सकता है कोई दूसरा नहीं। वे कहते थे तुम्हारे अंदर जो कुछ है अपनी शक्तियों द्वारा उसी का विकास करो पर कभी भी दूसरों का अनुसरण करके नही’। वे नवयुवकों को ध्येयवादी होने की निरंतर प्रेरणा देते रहते थे । वे भारत को अमर भारतकी संज्ञा देते थे।

स्वामी जी हमेशा कहते थे कि यदि भारतवासियों ने पाश्चत्य भौतिकवादी सभ्यता के चक्कर में पड़कर आध्यात्मिकता का आधार त्याग दिया तो उनके परिणाम स्वरूप तीन पीढ़ियों में ही उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, जिसका सीधा परिणाम होगा सर्वतोन्मुखी सत्यानाश । स्वामी विवेकानंद जी ने जो आशंका दो सौ वर्ष पहले व्यक्त की थी उसका उदाहरण अपने संस्कारों को भूल रही वर्तमान युवा पीडी में दिखाई दे रहा है |

स्वामी जी एक सच्चे वेदांती थे वे सत्य के अनुपालन के समर्थक थे उनकी दृष्टि में सत्य वही है जिससे व्यक्ति एवं समाज दोनों का हित हो उन्होंने प्राचीन भारतीय वैदिक संस्कृति को जीवन के शाश्वत मुल्यौं के रूप में स्वीकार किया | स्वामी जी के अनुसार सच्चे मायने में सच्चा भारतीयवह है जो भारतीय मूल संस्कृति कोअपने आप में समाहित किए हुए है और इसके मूल्यों का पालन करता है |

अत: युवा पीड़ी को स्वामी विवेकानंद जी के दर्शन और उच्च विचारधारा को स्वीकार करके सनातन वैदिक संस्कृति को समझने, जानने एवं आत्मसात करने की आवश्यकता है |

विभाग प्रभारी इतिहास  विभाग,  राजकीय स्नातकोत्तर महाविदयालय कोटद्वार, 

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