सम्पूर्ण गांव को एकता के सूत्र में पिरोने वाले योगी व धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे घनश्याम सिंह रावत

Ghanshyam Singh Rawat was a yogi and a person of religious tendency, who united the whole village in the thread of unity

रिपोर्ट: हर्षमणि बहुगुणा

न जायते म्रियते वा कदाचित्, नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।

अजो नित्य: शाश्वतोऽयं  पुराणो,न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।।

 यह आत्मा न तो जन्मती है, न मरती है, क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है।

वास्तव में यह एक रहस्य ही बना है कि मनुष्य कहां से आया कहां चला जाता है। जब तक है तब तक संसार की विषय वासनाओं में लिप्त है। साल २०२० का कैलेंडर पुराना हो गया है व २०२१ के नये कैलेण्डर की आवश्यकता है तो इस पुनीत पर्व पर पूज्य पण्डित श्री महेश्वरानंद बहुगुणा जी की याद ताजा हुई व उनके प्रिय यजमान दिखोल गांव के सम्मानित मनीषियों में- गांव के सयाणा प्रात: स्मरणीय श्री विशन सिंह रावत जी के सुपुत्र श्री नारायण सिंह रावत जी, जो अपने वंश में श्री सदर सिंह रावत जी को जन्म देकर अकाल कवलित हो गये व उनके पालन पोषण का दायित्व अपने छोटे भाई स्व०श्री घनश्याम सिंह रावत जिन्हें चम्बा क्षेत्र की जनता बिरला (जी) के नाम से भी जानती थी, को सौंप कर रोती-बिलखती सहधर्मिणी को छोड़कर गांव व बान्धवों को अलविदा कह कर स्वर्ग सिधार गए। स्व० सदर सिंह रावत जी का अनुपम व्यक्तित्व था अपने चाचा श्री का सहयोग व आज्ञा पालन ही अपना महत्वपूर्ण दायित्व माना व अपनी सहधर्मिणी श्रीमती पूर्णिमा के साथ मिलकर धार्मिक कर्म करते हुए ग्राम वासियों के साथ कार्य करते हुए जीवन यापन भी करते रहे ।

ईश्वर कृपा से श्री रघुवीर सिंह रावत (कवि रोचक नाम से भी जाने जाते हैं), श्री युद्धवीर सिंह रावत व श्री गम्भीर सिंह रावत तीन सुपुत्रों व  एक पुत्री को जन्म देकर देवी पूर्णिमा भी अकाल कवलित हो गई अबोध बच्चों का लालन-पालन पिता व दादाजी के कन्धों पर रख दिया और दोनों ने इस दायित्व का निर्वहन कुशलता से पूरा किया और सन् २००१ को इस धरा धाम को अलविदा कह कर स्वर्ग सिधार गए । “‘  गीता के इस उपदेश का अक्षरशः पालन किया गया –

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:। उभयोरपि दृष्टोsन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि: ।।

 श्री घनश्याम सिंह रावत जी कर्मठ व्यक्तित्व के धनी, योगी, धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे , जिन्होंने सम्पूर्ण गांव को एकता के सूत्र में पिरो रखा था । आपका जन्म सन् १९००में  हुआ । आपके दो सुपुत्रों श्री गबर सिंह रावत जी व श्री बचन सिंह रावत जी अपने नाम के अनुरूप ही कर्म क्षेत्र में नियुक्त हुए श्री गबर सिंह जी ने दिल्ली में अपना कार्य क्षेत्र बना कर तीन सुपुत्रों के साथ जीवन यापन का उद्देश्य बनाया था किन्तु विधाता ने कुछ और ही रचा था उनका बड़ा बेटा श्री बिजेंद्र सिंह रावत सन् १९८४ में हंसते खेलते परिवार में मातम छा कर असमय अकाल कवलित हो गया, इससे पिता का मनोबल टूट गया व उनके दो अन्य पुत्र भी हतोत्साहित हुए, दूसरा बेटा राजेन्द्र रावत को चिंता युक्त रहने की आदत सी पड़ गई आज भी दिल्ली में अपने सद्व्यवहार से परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं तीसरे बेटे श्री दिनेश रावत ने अब दिल्ली में रहना उपयुक्त नहीं समझा व देहरादून में अपना आशियाना बना कर रह रहे हैं ।  

बिरला जी के दूसरे सुपुत्र श्री बचन सिंह रावत जी ने परिश्रम कर उच्चतम शिक्षा अर्जित की व उद्योग विभाग से निदेशक पद से सेवानिवृत्त हो कर अपने चारों सुपुत्रों के अनुरोध पर देहरादून में ही अपना निवास बनाया , धार्मिक सहधर्मिणी सदैव सन्मार्ग की प्रेरणा प्रदान करती रहती थी किन्तु विधि का विधान कौन समझेगा, चम्बा से देहरादून जाते समय बस की दुर्घटना में यद्यपि गहरी चोट तो नहीं आई परन्तु हादशे के कारण अधिकांश अस्वस्थ रहने लगे व सन् २००२ अगस्त में इस पंच महाभूतों से निर्मित शरीर को छोड़कर  अपने बच्चों व सहधर्मिणी को रोता बिलखता छोड़ कर अन्तिम प्रयाण किया।  

परिवार के सदस्यों ने जय पराजय, लाभ हानि और सुख दु:ख को समान समझ कर उनकी और्ध्वदैहिक क्रिया कर्म किया।

जैसे गीता का उपदेश भी है ।

सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।

उनके सुपुत्र श्री विजय राज रावत  यफ आई आर  से निदेशक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद देहरादून में है , दूसरे सुपुत्र श्री वलराज सिंह रावत केन्द्रीय विद्यालय संगठन में जम्मू-कश्मीर में कार्य रत है श्री बुद्धि राज देहरादून में शिक्षण कार्य कर रहे हैं व श्री स्वराज रावत वकालत का व्यवसाय कर समाज सेवा कर रहे हैं। 

स्व. श्री घनश्याम सिंह रावत जी ने चम्बा में ही नहीं देहरादून तक अपनी कीर्ति पताका फहराई व चम्बा में दुर्गा मंदिर की स्थापना 15 अप्रैल 1970 राम नवमी के दिन देवी भागवत पुराण के साथ प्राण प्रतिष्ठा कर सम्पन्न की। यह मंदिर आज श्रद्धालु भक्तों को पूजा अर्चना के लिए एक उपयुक्त स्थान उपलब्ध करवा रहा  है। चम्बा में देवी के स्थापना के इस पुनीत कार्य को पूर्ण करवा कर अपना परलोक तो सुधारा ही, चम्बा की जनता पर कृपा भी की। यह थी आपकी उदारता , आपके संकल्प को पूरा किया आपके पौत्रौं ने क्योंकि आपने अपना पंचभौतिक शरीर सन् १९७७ में स्वर्ग में शुभ कार्य हेतु छोड़ दिया था। उस पुण्यात्मा को कोटि-कोटि नमन।

आपके दामाद  स्व० श्री बचन सिंह नेगी जी चम्बा में विकास खण्ड के काफी लंबे समय तक क्षेत्र प्रमुख रहे । सादगी से जीवन यापन करने में अग्रणी भूमिका का निर्वहन किया, हर व्यक्ति से चाहे वह छोटा हो या बड़ा , मित्रता के साथ मिलना व उनके हर कार्य को अपना उत्तर दायित्व समझ कर पूरा करना , यही समाज सेवा का भाव भरा था उनके हृदय में , आश्चर्यजनक घटना है तब की जब हम पढ़ते थे अगस्त के पहले सप्ताह फीस माफी की बैठक होती थी मेरे एक साथी की फीस माफ न हो   सकी उसने श्री नेगी जी के पास आकर अपनी फरियाद की,  और सहिष्णुता की प्रति मूर्ति श्री नेगी जी विद्यालय की ओर चल दिए व उसकी फीस माफ करवा कर ही वापस लौटे । आज का नया टिहरी नगर कुलणा में बसाने का श्रेय भी श्री नेगी जी को ही है ।

दूसरे दामाद ग्राम सोंदकोटी के स्व. श्री सूरत सिंह नेगी जी नरेंद्र नगर में जिला अधिकारी कार्यालय ( कलॅक्टरेट ) में कार्यरत थे। जिलाधिकारी कार्यालय से सम्बंधित कार्यो में वे क्षेत्र वासियों की बहुत सहायता करते थे। धन्य हैं ऐसी विभूतियों को, मैं नये कैलेण्डर वर्ष की इस पुनीत वेला पर सभी दिवंगत विभूतियों को कोटि-कोटि नमन करता हूं तथा दिवंगत विभूतियों को श्रृद्धासुमन समर्पित करते हुए भाव भीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं व उनसे यह प्रार्थना भी करता हूं कि इस क्षेत्र पर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखेंगे । क्योंकि यहां असहिष्णुता का साम्राज्य व्याप्त होता जा रहा है , मानवता प्राय: समाप्ति की ओर अग्रसर हो रही है , अतः ईश्वर से यहां की रक्षा व सुरक्षा का प्रस्ताव अवश्य रखियेगा।

बिरला जी के पोते विजय राज रावत की टिप्पणी

दादा जी का “बिरला” नाम के पीछे भी एक रोचक कहानी है। सन 1968-69 के आस पास सेठ घनश्याम दास बिरला सपरिवार तीर्थ यात्रा में गंगोत्री यमुनोत्री भ्रमण पर अपनी गाड़ियों के काफिले के साथ चम्बा में चाय आदि विश्राम के लिए रुके।

कौतूहल बस दादा जी वहां गए और पूछा कि ये कौन हैं जो इतनी गाड़ियों के साथ यह आये है। उन्ही में से किसी ने बताया कि ये सेठ घनश्याम दास बिरला हैं यात्रा पर जा रहे हैं। हमारे दादाजी का आत्म विश्वास बहुत बड़ा था। वे तुरंत सेठ बिरला जी को मिले चम्बा में उनका स्वागत किया। उन्हें यात्रा की शुभकामनाएं दी तथा निवेदन किया कि आप तो बहुत धर्मात्मा है। पुण्य का काम करते है आपने बहुत मंदिर आदि बनाये हैं और निवेदन किया कि यहां पर चंबा में कोई मंदिर नहीं है एक भगवती माता का मंदिर बनवाने में सहायता करें। सेठ बिरला ने अपने निजी सचिव जो साथ चल रहे थे, उन्हें दादाजी का नाम पता नोट करवाया।

यात्रा की शुभकामनाओं के साथ सेठ जी ने आगे प्रस्थान किया। कुछ समय प्रतीक्षा करने के पश्चात कोई जवाब न मिलने पर उन्होंने सेठ बिरला को पत्र द्वारा अपनी मुलाकात का स्मरण दिलाया। कुछ समय पश्चात सेठ बिरला जी द्वारा एक पार्सल दादा जी के नाम आया। जिसमे सेठ बिरला द्वारा मंदिर हेतु अपने योगदान के रूप में दुर्गा देवी की संगमरमर की मूर्ति भेंट की।

उस मूर्ति की स्थापना दादाजी ने चम्बा में देवी भगवती का मंदिर बनाकर  विधि विधान से 1970 में कई गई। संयोग से दादाजी का नाम भी घनश्याम सिंह था तथा सेठ जी का नाम  भी घनश्याम दास बिरला था, चम्बा में स्थानीय लोग दादाजी को बिरला जी या बिरला सेठ कहने लगे।

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