स्वतंत्रता संग्राम सेनानी  श्री राम चन्द्र उनियाल

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा, 

प्रकृतेर्गुणसम्मूढा: सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ।।
आज हमारा गणतंत्र इकहत्तर वर्ष का पूरा हो जाएगा व कल से वहत्तरवें वर्ष में प्रवेश करेगा। अतः आज के इस पुनीत पर्व पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी  श्री राम चन्द्र उनियाल जी को भावभीनी पुष्पांजलि अर्पित करने के सुअवसर को प्राप्त करने की कोशिश कर रहा हूं।


सकलाना पट्टी का उनियाल गांव मां श्री कण्ठा (सुरकूट बासिनी ) की तलहटी में स्थित प्रज्ञावान एवं उर्जावान व्यक्तित्वों से आच्छादित है और रहेगा भी। जिस गांव के मनीषियों के मन में अपने स बड़ों के प्रति अगाध श्रद्धा व आदर का भाव विद्यमान है, जहां सदैव अतिथियों की पूजा अर्चना होती है, जहां सहिष्णुता एवं सम्मान का भाव सदैव भरा हुआ रहता है वहां लक्ष्मी, सरस्वती व शक्ति हमेशा विराजमान रहेगी ही। आज उसी गांव के परम प्रतापी, शान्त, निर्विकार, दयालु व ईमानदार व्यक्तित्व के धनी श्री राम चन्द्र उनियाल जी को अपने श्रद्धासुमन समर्पित करने का प्रयास कर रहा हूं ।

आप किसी भी पहचान के मोहताज नहीं है फिर भी आपके व्यक्तित्व की याद सदैव मन में रहती है उसी के परिणामस्वरूप आज का दिन मिल ही गया । स्वतंत्रता की ललक जिनकी रग – रग में भरी थी, जिन्होंने नाम के लिए काम नहीं किया अपितु देश हित, क्षेत्र हित के लिए ही अपने को समर्पित किया। ऐसे महामानव का आविर्भाव श्री इन्द्र देव उनियाल जी व लक्ष्मी स्वरूपा श्रीमती इन्द्रा देवी के यहां ७ अक्टूबर सन् १९२० को हुआ ।

उस राजशाही के युग में प्रारम्भिक शिक्षा की सुव्यवस्था नहीं थी । फिर भी ‘ होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ किसी तरह वर्नाकूलर मिडिल परीक्षा पास कर आगे की शिक्षा के लिए टिहरी गये व वहां से हाईस्कूल परीक्षा पास कर आगे की कक्षा में प्रवेश लिया ही था कि स्वतंत्रता की आग जो मन में घर कर गई थी भड़कने लगी बाल सभा व रेडक्रास संस्था में रह कर जन जागृति के साथ गोपनीय बैठक करते हुए सामन्ती हुकुमत के खिलाफ हड़ताल करवा दी , परिणामस्वरूप कई छात्रों को विद्यालय से निकाल दिया, कुछ पर अर्थ दण्ड लगाया व आप को पोस्टर लगाने के आरोप में गिरफ्तार कर चार महीने तक पुलिस हिरासत में रखा ।

सुमन जी का सानिध्य आप को और अधिक कट्टर स्वतंत्रता समर्थक बनाने में मदद गार हुआ। १९३९ में गिरफ्तार किया गया, मुकदमा चला,१९४१ में एक वर्ष की सजा हुई । आपके पिता श्री तो पुलिस कर्मी थे , राज भक्त थे, राजा को बोलान्दा बद्रीश मानते थे, अतः पिता ने अपने पुत्र को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया जहां १४माह तक हिरासत में रखा गया ।

यह थी नैतिकता, आज शायद ऐसा दृश्य देखना दुर्लभ ही होगा यदि पिता कहीं राजशाही में हो तो अपने पुत्र को वहीं नौकरी लगा देंगे भले ही वह अयोग्य ही क्यों न हो , आज राजनीति स्वार्थनीति बन कर रह गई है, तब राष्ट्र भक्ति थी जन हित सर्वोपरि था । सुमन जी के बलिदान के बाद अस्वस्थ रहने लगे व गांव में ही नजर बन्द कर दिया । प्रजा मण्डल के कार्य में लगे रहते थे। जेल में ही ‘ पुकार’ पुस्तक लिखी । स्वतंत्रता के बाद फिर गिरफ्तार किया गया , शायद जेल से घर का नाता बन गया था।

पिताजी की इच्छा थी कि उनका सुपुत्र घर पर रहे, अच्छी शिक्षा ग्रहण कर सरकारी अधिकारी बने, हर पिता की यही कहानी है । आपका विवाह केवल इस कारण किया कि आप का रुझान घर गृहस्थी में लगे, परन्तु आप की लगन तो देश सेवा के प्रति थी। पत्नी श्रीमती जगदम्बा देवी अपनी सास की तरह अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति थी। जंगल के बीच अपना घर था, निर्भीकता के साथ वहां रहना । दो बहिनें व एक भाई श्री जीवानन्द उनियाल , १९५३ में उनका विवाह श्रीमती शकुन्तला देवी से हुआ , वे राजस्व विभाग में लेखपाल (पटवारी ) के पद पर कार्य रत थे। किन्तु विधि का विधान या दुर्भाग्य के कारण १९५५ में श्री जीवानन्द उनियाल जी के असामयिक निधन से पूरे परिवार पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा, कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि क्या किया जाए । परन्तु सम्बल व धैर्य देने वाला भी वही है जिसने विपत्ति दी है ।* “”‘ कहा भी है कि–
न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् ।
यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम् ।।
“‘ *भारत में दूसरी लोकसभा व उत्तर प्रदेश में भी दूसरी विधानसभा के चुनाव १९५७ में हुए व आप उत्तरकाशी विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए । तब टिहरी उत्तरकाशी एक ही जनपद था, आप टिहरी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे ।

आपने विधायक बनने पर कई महत्वपूर्ण कार्य किए, परन्तु धन संग्रह नहीं किया, यहां तक कि अपनी अनुज वधू जो मात्र बीस वर्ष की आयु में वैधव्य के साथ जी रही थी, के लिए पेंशन भी नहीं दिला पाए , अपनी सुपुत्री के विवाह के समय जब सलाह पत्रिका पूजन हेतु मेहमान आये तो घर पर आटा तक नहीं था, साग-सब्जी और मेहमान दारी की बात अलग। (आज कल तो साह पट्टा में न जाने कितने सपने पूरे होते हैं ) अनुज वधू की पेंशन का कार्य १९९० के बाद ही हो पाया ।

चिंतन अनूठा था – अपनी दोनों बहनों को बहुगुणा परिवार की गृहलक्ष्मी बनाया व अपनी दोनों बेटियों को भी बहुगुणा परिवारों की बहु बनाकर विदा किया परन्तु अपनी घर की शोभा बढ़ाने के लिए ‘वसुधैव कुटुंबकम् ‘ की भावना से ओत-प्रोत रह कर चतुर्दिक से ढूंढ – ढूंढ कर पुत्र वधुयें अर्जित की । यद्यपि यह जन आपसे परिचित था , परन्तु आपको तब और अच्छी तरह समझ सका जब मैं उत्तर काशी , भटवाड़ी में शिक्षण का कार्य करता था व हमारे विद्यालय में एक आयोजन था, जिसमें उस समय के उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री श्री बलदेव सिंह आर्य जी, टिहरी के विधायक श्री रांगड़ जी व आप भी पधारे थे। संयोग से उस कार्यक्रम का संचालन करने का सुअवसर प्राप्त हुआ । तब आपका वात्सल्य देखने को मिला व आपको निकट से देखने का सुयोग बना ।

आप प्राय: कहा करते थे कि यदि हम दोनों में से एक भी चला गया तो दूसरे का जीवन दूभर हो जाएगा । और विधि के विधान के अनुसार सन् १९९४ में सहधर्मिणी श्रीमती जगदम्बा देवी के असामयिक / आकस्मिक निधन से एक सूत्र में बन्धा परिवार पूरी तरह बिखर सा गया व आपका स्वास्थ्य भी अनुकूल नहीं रहने लगा । समय की क्रूरता के कारण २१ मई २००४ को आपका यह पंचभौतिक शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया ऐसा लगा कि विधि ने हमारे साथ क्रूर मजाक किया हो , परन्तु विधाता की लेखनी को कौन मिटा सकता है । इस लिए इस असहनीय दु:ख को सहन करना पड़ा । यह भी तो है ।–
*यथा यथा हि पुरुष: कल्याणे कुरुते मन: ।
*तथा तथास्य सर्वार्था: सिद्ध्यन्ते नात्र संशय: ।।*समय बदलते कोई देर नहीं लगती ‘व’अक्षर से नामित आपका सुपुत्र श्री वीर चन्द्र उनियाल व श्रीमती विमला बहुगुणा असमय अकाल कवलित होने से सम्पूर्ण परिवार व बच्चों को रोता बिलखता छोड़ कर अन्तिम प्रयाण कर सबके दु:ख का कारण बने। भगवान दिवंगत आत्माओं को शांति प्रदान करने की कृपा करेंगे । शेष समूचे परिवार के प्रति हार्दिक शुभकामनाएं हैं । प्रात: स्मरणीय विभूतियों को कोटि-कोटि नमन व भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपने श्रद्धासुमन समर्पित करने का प्रयास कर रहा हूं व प्रार्थना है कि अपनी तरह ही ऊर्जा वान सबको बनाने की प्रेरणा की सिफारिश ईश्वर से अवश्य करेंगे ।* “” स्वीकार्य है कि —
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।

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