पुराने अखबार की एक कतरन: व्यंग्यबाण हैं या साधारण

भारत में नियुक्त ब्रिटिश अधिकारी की पत्नी की आत्मकथा के कुछ अंश।

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा

पुराने अखबार की एक कतरन मिली जिसमें ललित शौर्य की यह रचना छपी थी ।

व्यंग्यबाण हैं या साधारण आप स्वयं तय कीजिए। 
” *हमने सुबह-सुबह नेता जी को*
*टहलते हुए देखा*
*उनके माथे में उभरी थी*
*चिन्ता की रेखा ।*
*हमसे रहा नहीं गया*
*यह दृश्य देखकर सहा नहीं गया*
*हमने नेता जी से पूछा*
*माथे पर चिंता की लकीरें क्यों ?*
*खींच ली हैं*
*चलते हुए अचानक ये आंखें क्यों ?*
*मीच ली हैं* ।
*वो बोले*।
*क्या बताएं भैय्या*।
*इस पेट ने परेशान किया है*
*उसनेे ही दौड़ने का आदेश दिया है*
*हमने कहा*
*पेट नहीं यह पिटारा हो चुका है*
*आसमान का ध्रुवतारा हो चुका है* ।
‘ *वे बोले* ‘
*बताओ कुछ उपाय*
*जिससे यह हो जाए कम*
*और मिट जाए मेरे गम*
‘ *मैं बोल पड़ा* ‘
*इसके अन्दर छुपे हैं*
*पुल, बांध, रास्ते, सड़क और हाइवे*,
*अब करनी का फल उठाइए*
*इसको कम करने के लिए*
*खाने की आदत में लगाइए विराम*
*तभी मिलेगा बड़ी तोन्द से आराम* । ”
“‘ *मंगलमय भविष्य की शुभकामनाओं सहित ,। स्वर्णिम प्रभात ।*। “‘

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