बालप्रहरी का 65 वां वेबिनार : बच्चों ने पत्र के माध्यम से की संस्कृति को बचाए जाने की अपील

अल्मोड़ा:  मोबाइल और इंटरनेट के आज के दौर में पत्र लेखन विधा विलुप्ति के कगार पर है।  पोस्टमैन, लेटर बॉक्स कभी हमारे बच्चों के लिए एक इतिहास बनकर रह जाएगा।

ये बात बालप्रहरी तथा बालसाहित्य संस्थान अल्मोड़ा द्वारा आयोजित 65वें वेबीनार को संबोधित करते हुए पत्र वाचन कार्यशाला के मुख्य अतिथि इंद्रगढ, मध्य प्रदेश़ के शि़क्षाविद्, विज्ञान लेखक तथा साहित्यकार चंद्रप्रकाश पटसारिया ने कही। ‘ डी जे के बढ़ते प्रचलन तथा हमारी संस्कृति’ विषय पर 30 बच्चों द्वारा लिखे गए पत्रों को सुनने के बाद पटसारिया जी ने कहा कि आज डाकघर तथा देश के दूसरे विभाग तथा संस्थाएं पत्र लेखन विधा को बढ़ावा देने के लिए पत्र लेखन की प्रतियोगिताएं कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि डाक विभाग द्वारा आयोजित पत्र लेखन प्रतियोगिता में उनके पत्र को राट्रीय स्तर पर चयनित किया गया। उन्होंने बच्चों से कहा कि जब हम दुखी होते हैं या हमें गुस्सा आता है। उस समय हम अपने दोस्त को पत्र लिखकर अपना मन हल्का कर सकते हैं।

कार्यशाला के अध्यक्ष मंडल में शामिल राजकीय इंटर कालेज नौकुचियाताल, नैनीताल  की कक्षा 12 की छात्रा अरूणा साह ने अपना पत्र पढ़ते हुए कहा कि डी जे संस्कृति के कारण हमारे उत्तराखंड के ढोल दमाऊं, छोलिया नृत्य, झुमैलो तथा मांगलिक गीत व शकुन ऑखर हाशिए पर चले गए हैं।

अध्यक्ष मंडल में शामिल सेंट एंथोनीज सीनियर सेकेंडरी स्कूल उदयपुर राजस्थान की कक्षा 8 की छात्रा भूमिका मेनारिया ने अपना पत्र पढ़ते हुए कहा कि आज शादी विवाह व अन्य समारोहों में दिखावा हो रहा है।

उन्होंने कहा कि भयंकर बीमारी कोरोना ने जहां पूरे देश को बरबाद कर दिया है वहीं कोरोना ने हमें सादगी के साथ विवाह व दूसरे समारोह आयोजित करने की प्रेरणा दी है। डायनेस्टी माडर्न गुरूकुल एकैडमी खटीमा के कक्षा 11 के छात्र अभिशेक कुमार ने अपना पत्र पढ़ते हुए कहा कि ध्वनि प्रदूषण मापने की इकाई को डेसीबल कहा जाता हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 45 डेसीबल से अधिक शोर मनुष्य के लिए खतरनाक हो सकता है। उन्होंने कहा कि बारात तथा अन्य अवसरों पर लोग 150 डेसीबल यानी बहुत ही ऊंची आवाज में डी जे तथा ध्वनि विस्तारक यंत्रों का प्रयोग करते हैं। इससे बहरा होने जैसी खतरनाक बीमारी हो सकती है।

अध्यक्ष मंडल में शामिल गुरूकुलम एकैडमी लोहाघाट की कक्षा 8 की छात्रा आद्या त्रिपाठी ने क्षेत्रीय विधायक को संबोधित पत्र में कहा कि लोग घ्वनि विस्तारक यंत्रों को ऊंची आवाज में चलाते हैं। नियम कानून को ठेंंगा दिखाकर रात देर तक ध्वनि विस्तारक यंत्रों को चलाते हैं।

उन्होंने प्रस्तावना में अपनी बात करते हुए कहा कि आज ही एक शादी में बहुत ऊंची आवाज में माइक चल रहा था। फोन करने पर शादी करने वाले घर के लोगों ने कहा कि जब सब लोग बजाते हैं। तब हम क्यों ने बजाएं। 

आद्या ने अपने पत्र में कहा कि कई गांवों में लोग शराब पीकर हूड़दंग मचाते हैं। कई बार डी जे के कारण खुशी नहीं अपितु झगड़ा व तनाव की स्थिति तक आ जाती है। आद्या ने क्षेत्रीय विधायक से देर रात तक चलने वाले डी जे पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रेमा जगाती सरस्वती विहार नैनीताल के कक्षा 11 के छात्र सुदर्शन सोराड़ी ने कहा कि पहले जमाने में विवाह तथा अन्य समारोहों में लोग अपने रिश्तेदारों को इसलिए बुलाते थे कि रिश्तेदार पूरे समारोह को संपन्न कराने में मदद करेंगे। परंतु अब तो गांव में भी सारे काम ठेके पर दिए जाने लगे हैं। उन्होंने कहा कि अब गांवों की बारात में शकुन आंखर व मांगलिक गीत सुनने को नहीं मिलते हैं। न ही पंडित द्वारा कहा जाने वाला गोत्राचार सुनने को मिलता है।

लाउडस्पीकर की आवाज में ये सब विलुप्त होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले से बारातों में भजन, कीर्तन, गीत, ढोलक वादन, नृत्य व स्वांग के माध्यम से महिलाएं तथा बच्चे अपनी प्रतिभा दिखाते थे। डी जे ने इन सबको  भी हड़प लिया है।

प्रिल्यूड पब्लिक स्कूल आगरा की कक्षा 6 की छात्रा अर्जरागिनी सारस्वत ने अपने  पत्र को पढ़ते हुए कहा कि  आज बर्थ डे तथा दूसरी पार्टियों में लोग घ्वनि विस्तार यंत्रों को इतनी तेजी से बजाते है कि इससे घर गांव के बूढ़े तथा बीमार लोगों को बहुत परेशानी होती है। इससे हाई ब्लड प्रेषर तथा हार्ट के रोगियों की जान तक जा सकती है।

आर्यमान विक्रम विरला इंस्टीट्यूट आफ लर्निग हल्द्वानी की कक्षा 9 की छात्रा रोमा चंद ने अपना पत्र पढ़ते हुए कहा कि अपने उत्तराखंड में रात्रि 10 बजे के बाद डी जे तथा ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर पाबंदी है। परंतु लोग मनमाने ढंग से देर रात या पूरी रात डी जे बजाते हैं। प्रशासन भी ऐसे लोगों पर कोई कार्यवाही नहीं करता है।

राजकीय इंटर कालेज दड़मियां,अल्मोड़ा की कक्षा 10 की छात्रा  योगिता नयाल ने कहा कि दूरस्थ गांवों में भी आज डी जे दिखावा हो गया है। सड़क से पांच सात किलोमीटर दूरी तक डी जे ढुलान करके गांवों में बजाया जा रहा है।

योगिता ने कहा कि पहाड़ के गांवों में बारातों में फूहड़ व अश्लील गाने बजते हैं । किसी को भी अपनी संस्कृति की परवाह नहीं है। कम से कम गांव के प्रधान तथा सयाने लोगों को इसके लिए पहल करनी चाहिए। डी जे यदि बहुत जरूरी है तो उसकी आवाज कम करके भी तो आंनद लिया जा सकता है।

कक्षा 4 में पढ़ने वाली बाल विकास विद्या मंदिर भटकोट, चौखुटिया की देवरक्षिता नेगी ने अपना पत्र पढ़ते हुए कहा कि डी जे के कारण कई बार शुभ कार्य में विघ्न पैदा हो जाता है। गांवों में झगड़ा हो जाता है।  नोजगे पब्लिक स्कूल खटीमा की कक्षा 3 की छात्रा ऋत्विक पचौली ने अपने पत्र में कहा कि डी जे में नाचते-नाचते कई बार लोग आपस में झगड़ने लगते हैं। इसके अतिरिक्त कार्तिक, अवंतिका, वेदमित, आदित्य, भूमि, सुविज्ञा, गीता, इधांत, काव्या, श्रीमन, सृजन, शिवसागर,चित्रांशी, कौस्तुभ, तन्मय, प्रेरणा आदि ने भी अपने पारिवारिक जनों को लिखे पत्रों में शादी में दिखावा न करने तथा डी जे को रात्रि में बंद करने तथा ऊंची आवाज में न चलाने की बात कही।

कुछ बच्चों ने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, जिलाधिकारी तथा स्थानीय विधायक को पत्र लिखे तो कुछ न संपादक के नाम पत्र लिखकर अपनी बात को पत्र के माध्यम से कहने का प्रयास किया।

 इस अवसर उत्तराखंड शिक्षा विभाग के उप निदेशक आकाश सारस्वत, बालप्रहरी के संरक्षक श्याम पलट पांडेय,  सुधा भार्गव(बैंगलौर), शशि ओझा (भीलवाड़ा), महेश जोशी(गरूड़), बृजमोहन जोशी (चंपावत), प्रेमप्रकाश पुरोहित (नंदप्रयाग), बलवंतसिंह नेगी(चौखुटिया), पंकज जोशी (डीडीहाट), करूणा पांडे(लखनऊ), डॉ. अर्चना त्रिपाठी (लोहाघाट), डॉ. खेमकरन सोमन (चौखुटिया), प्रमोद दीक्षित (बांदा) आदि ने ऑनलाइन बच्चों की प्रस्तुति को सुना।

प्रारंभ में बालप्रहरी के संपादक तथा बालसाहित्य संस्थान के सचिव उदय किरौला ने सभी का स्वागत किया। अंत में बालप्रहरी के संरक्षक श्याम पलट पांडेय ने सभी का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में प्रतिभाग करने वाले सभी बच्चों को ऑनलाइन प्रमाण पत्र दिए गए।

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