एक सुशिक्षक थे श्री शम्भू प्रसाद बहुगुणा

एक सुशिक्षक थे श्री शम्भू प्रसाद बहुगुणा

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा

प्राणस्याssभ्यन्तरे चित्तं चित्तस्याssभ्यन्तरे जगत्।

विद्यते विविधाकारं  बीजस्यान्तरिव द्रुम:। (यो०वा०)

दिवंगत पुरुषों का जो प्राण निकलता है, उसके भीतर चित्त स्थित होता है। चित्त के भीतर जगत् ऐसे व्याप्त है,- जैसे- बीज के भीतर वृक्ष।

 आज जिस महापुरुष को स्मरण करने की कोशिश कर रहा हूं, आज उनकी पुण्यतिथि है। आज से २८ वर्ष पूर्व ३ दिसंबर सन् उन्नीस सौ ९२ के दिन, अचानक एक सामान्य सी बीमारी के कारण हम सभी को रोता बिलखता छोड़ कर अपने तीन सुपुत्रों व सहधर्मिणी श्रीमती विजया बहुगुणा की गोद में इस गांव की माटी से विदाई ली व इस क्षेत्र का वह प्रज्वलित दीपक  सदैव के लिए बुझ गया था, आज मात्र नाम शेष है। ऐसे महामनीषी प्रात: स्मरणीय श्री शम्भू प्रसाद बहुगुणा जी को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि समर्पित करता हूं।

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।

यह सिद्ध है कि अभाव का कभी भाव नहीं होता और भाव का कभी अभाव नहीं होता। गीता।

इस माटी की महक बड़ी अनुपम है जहां प्रात:स्मरणीय श्री अम्बा दत्त बहुगुणा जी के चार सुपुत्रों में से दूसरे सुपुत्र स्व० श्री महानन्द बहुगुणा जी के तीन सुपुत्रों में आप सबसे छोटे पुत्र थे। बड़े स्व० श्री कामेश्वर प्रसाद बहुगुणा जी सर्वोदय की भावना से ओत-प्रोत सबका अभ्युदय चाहते थे तो दूसरे सुपुत्र स्व० श्री रामेश्वर प्रसाद बहुगुणा जी मां काली के अनन्य भक्त जिसके सिर पर भी स्नेह का हाथ रखा वही फलीभूत हुआ। तीसरे सुपुत्र आप का जन्म ०७ मार्च १९४६ को हुआ था जो एक सुशिक्षक थे और उस समय जब शिक्षा का प्रसार प्रसार कुछ कम था तब भी प्राथमिक शिक्षा में शिक्षक के रूप में सकलाना क्षेत्र में नियुक्त हुए। इधर रानीचौंरी में श्री योगेश चन्द्र बहुगुणा जी,  श्री दर्शन लाल बहुगुणा जी , श्री गंगा प्रसाद बहुगुणा जी आदि मनीषियों ने समुचित शिक्षा के प्रसार हेतु जूनियर हाईस्कूल तक की शिक्षा के लिए ग्राम भारती विद्या मंदिर जो १९५६से प्रारम्भ किए गए विद्यालय जो बीच में सुशिक्षकों के अभाव के कारण बन्द करना पड़ा था को पुनः स्थापित किया। ऐसे विद्यालय में आपको प्रधानाध्यापक का दायित्व सौंपा, आपने  शिक्षा की समुचित व्यवस्था हेतु कभी ‌बेड़छी गुजरात तो कभी किसी अन्य स्थानों का भ्रमण किया।

वर्ष १९७५ में बी , एड, कर उक्त विद्यालय का पूर्ण कार्य भार सम्भाला  , वर्ष १९८३ में हाई स्कूल की मान्यता व वर्ष १९८६ में इण्टर स्तर की मान्यता प्राप्त कर ११ अक्टूबर सन् १९८९ में प्रान्तीय करण करवा कर राजकीय इण्टर कॉलेज का दर्जा दिलाया। प्रबल अनुशासन क्षमता, सदैव छात्र हित में समर्पित अचानक छोटी सी बिमारी (पीलिया) के कारण जिस उच्च तम शिखर पर पहुंचना था नहीं पहुंच पाए, यह था हमारा दुर्भाग्य। आज मैं समस्त ग्राम वासियों व राजकीय इण्टर कॉलेज रानी चौंरी के सुशिक्षकों व कर्मचारियों सहित भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं  व ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि दिवंगत विभूतियों को स्वर्ग (मोक्ष) की प्राप्ति हो तथा उनका मार्गदर्शन क्षेत्र वासियों को मिलता रहे, इसी कामना के साथ कोटि-कोटि नमन व भावपूर्ण श्रद्धासुमन समर्पित। आप एक सुगन्ध थे, जो इस गांव से बाहर निकल कर अन्य स्थानों को महका रहे हैं।

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतिश्वर:।

गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्।।

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