स्व. श्री राम प्रसाद बहुगुणा जिन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़ शैक्षिक उन्नयन का विकल्प चुना

स्व. श्री राम प्रसाद बहुगुणा जिन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़ शैक्षिक उन्नयन का विकल्प चुना

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा

कर्मणा जायते जन्तु: कर्मणैव विलीयते ।

सुखं दु:खं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते ।।

आज पुनः प्रात: स्मरणीय सुरेशा नन्द बहुगुणा जी के द्वितीय एवं तृतीय सुपुत्रों को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए इस वंश की वृद्धि की कामना करते हुए उनसे उनके आशीर्वाद की याचना करता हूं। आपके तृतीय सुपुत्र स्व० श्री चण्डी प्रसाद बहुगुणा औषधि शास्त्र के मर्मज्ञ, कर्मकाण्ड व ज्योतिष के विशेषज्ञ थे। आपके तीन पुत्रों में सबसे छोटे श्री नीलाम्बर बहुगुणा अकाल कवलित हो गये थे। बड़े सुपुत्र स्व० श्री वीरेन्द्र दत्त बहुगुणा जी सुयोग्य शिक्षक, संस्कृत व कर्मकाण्ड के मर्मज्ञ थे।

आपने अपने तीन सुपुत्रों श्री जितेन्द्र बहुगुणा जी, श्री शिव प्रसाद बहुगुणा जी व श्री सुनील बहुगुणा जी, जो सुयोग्य राज्य कर्मचारी रहे व हैं को अपना उत्तर दायित्व असमय में प्रदान कर इस असार – संसार को अलविदा कहा। श्री पीताम्बर दत्त बहुगुणा जी धार्मिक प्रवृत्ति के रहे व वह भी असमय ही काल के गाल में समा गए। शायद मनुस्मृति में तभी कहा कि –

एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।

 स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।।

उन दिवंगत विभूतियों की फोटो तलाश की परन्तु जिन अद्वितीय मनीषी/ विभूति की यह फोटो है आप पं० सुरेशा नन्द बहुगुणा जी के (द्वितीय सुपुत्र स्व० श्री जय पति बहुगुणा जी के सुपुत्र) सबसे बड़े पौत्र है, शालीनता की प्रति मूर्ति के साथ त्यागी, चार भाइयों में सबसे बड़े, आपके अनुज देवदत्त जो आज नहीं है, दूसरे श्री रघुवीर प्रसाद बहुगुणा कार्यालय अधीक्षक से सेवा निवृत्त अपने दो सुपुत्रों के साथ सुन्दर जीवन यापन कर रहे हैं।

तीसरे भाई श्री हरि गोविन्द बहुगुणा जी भी पंचायत राज विभाग से सहायक पंचायत अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हो कर अपने दोनों सुपुत्रों के साथ जीवन यापन कर रहे हैं आप दोनों की मंगल मय जीवन की शुभकामनाओं सहित।

उस समय शिक्षा का प्रसार कम था

प्रात: स्मरणीय राम प्रसाद बहुगुणा जी ने २५ जुलाई सन् उन्नीस सौ २५ में इस धरा पर अवतरित हो कर इस माटी को पवित्र तो किया ही हमारे स्वप्नों को भी साकार किया व त्याग की अनूठी मिसाल पेश की।  शायद सुशिक्षा प्रदान करने के लिए आपका अवतरण हुआ। उस समय शिक्षा का प्रसार कम था, हाई स्कूल तक शिक्षा ग्रहण कर पहले पुलिस विभाग में सेवा हेतु गये किन्तु पुलिस विभाग का रवैया रास नहीं आया व वहां त्याग पत्र देकर शिक्षा विभाग में बेसिक शिक्षा के दायित्व का निर्वहन करने हेतु स्वीकृति प्रदान कर अपने क्षेत्र के नौनिहालों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए सुशिक्षा प्रदान करते रहे। विधि का विधान बहुत विचित्र है।

सन् उन्नीस सौ ६३ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन आपकी सहधर्मिणी अपने सुपुत्र श्री केशव बहुगुणा व दो सु पुत्रियों का भार अपनी सास व आप पर छोड़ कर अन्तिम प्रयाण के लिए प्रस्थान कर गयी। अकाल कवलित पत्नी की विरहाग्नि बुझी भी नहीं थी  तो गांव के शुभ चिंतकों ने पुनर्विवाह हेतु प्रयास किया, किन्तु निराला जी की तरह व देवव्रत की तरह प्रतिज्ञा की कि आजीवन अपने दायित्व का निर्वहन कर पुत्र व पुत्रियों का लालन-पालन ही करूंगा तथा दो जुलाई सन् २००७ तक विधुर रह कर कुटुम्ब का पालन पोषण किया। ऐसे मनस्वी महामानव को याद कर आज उन्हें व  उनके पूर्वजों को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए श्रद्धासुमन समर्पित करता हूं” आपकी सौजन्यता सदैव स्मरण रहेगी। कहा भी है कि –

सज्जन दुर्जन संग को बूंद स्वाति का मान।

चातक मुख पड़ प्यास हर नाग कण्ठ बिष जान।।

Print Friendly, PDF & Email
Share