उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के 20 वर्ष

डाॅ0 दलीपसिंह बिष्ट,
लम्बे संघर्ष और यातनाओं के बाद जब उत्तराखण्ड अलग राज्य बनाया गया तो यह लोगों का वर्षों का सपना सच होना था, जिसकी खुशी यहां के जनमानस में देखने को मिली उसे शब्दों में बयां नही किया जा सकता है, पृथ्का राज्य प्राप्ति अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी। लागों को विश्वास हो गया था कि अब उनकी समस्याओं के समाधान होने का वक्त आ गया है।

राज्य के पास वे सभी संसाधन मौजूद है जिनके आधार पर वह विकास की दृष्टि में अग्रणी राज्यों में शुमार हो सकता था। लेकिन विकास हुआ है परन्तु आशा के अनुरूप नही कहा जा सकता है क्योंकि आंदोलनकारियों का सपना राज्य के अन्तिम व्यक्ति तक सत्ता का लाभ पहुचाना था जो आज भी उपेक्षित है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन जैसे मुद्दों पर काम तो हुआ है परन्तु आज भी यही मुद्दे सर्वाधिक विचलित करते है। भले सरकार द्वारा गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया है लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर राज्य इसका अतिरिक्त बोझ कैसे उठा पायेगा?

यह विचारणीय प्रश्न है? यही नही यह मुद्दा समस्यायें के समाधान से ज्यादा राजनीतिक का प्रश्न बना हुआ है, क्योंकि जो दल सत्ता में रहता है उसके लिए राजधानी का मुद्दा गौंण हो जाता है और जो सत्ता से बाहर होता है वह राजधानी के मुद्दे को लेकर आंदोलनरत हो जाता है। उत्तराखण्ड क्रांति दल का भी यही हाल रहा उसके जो सदस्य जीत कर आते है। वह सरकार के हिस्सेदार बन जाते है और हार जाते है तो राजधानी जैसे मुद्दो पर मुखर हो जाते।

राज्य निर्माण की 20वीं वर्षगांठ आते-आते युवाओं के चेहरों पर उदासी साफ-साफ पढ़ी जा सकती है। राज्य में आज भी विभिन्न समस्यायें जैसे; पलायन का दंश झेल रहे वृद्ध मां-बाप, रोजगार के लिए पलायन कर रही युवा पीढ़ी, घास, पानी, लकड़ी की व्यवस्था व बच्चे, वृद्वों की देखभाल में जूझती महिलायें, शिक्षकों एवं भवनों के अभाव में पेड़ों के नीचे खपता बचपन, डाॅक्टरों एवं चिकित्सा उपकरणों के अभाव में लड़खड़ाती जिन्दगी, पानी के लिए तरसती टंकी व स्टैण्ड पोस्ट, यातायात के अभाव में हिचकोले खाते व सड़क हादसों में मरते सैकड़ों लोग राज्य के बीस वर्षो के विकास बयां करने के लिए काफी हैं। राज्य का विकास हुआ है सड़के बनी, स्कूल बने, अस्पताल बने, रोजगार मिला, परन्तु फिर भी ये समस्यायें पूर्ववत की भांति बनी हुई हैं।

उत्तराखण्ड के लोग उपेक्षा व भेदभावपूर्ण नीतियों के लिए कभी लखनऊ को कोसा करते थे आज उसका प्रमुख केन्द्र राज्य की राजधानी देहरादून बन गया है। नीतियों का यह आलम है कि सरकारी भवनों जैसे स्कूलों के निर्माण कार्य के लिए जो मानक व बजट देहरादून के लिए निर्धारित किया जाता है वहीं मानक व बजट राज्य के दूरस्थ गांवों के लिए भी निर्धारित किया जाता है जो कि भेदभाव के सिवाय कुछ नही है।

राज्य निर्माण के बीस वर्षों बाद भी बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, बिजली, सड़क, पर्यावरण, राजधानी जैसे मुद्दे जस के तस बने हुए है। राजनीतिक दलों की नाक का प्रश्न बना उत्तरांचल अवश्य ही उत्तराखण्ड बन गया, जो कि उत्तर प्रदेश में रहते हुए उत्तरांचल बनाम उत्तराखण्ड विकास विभाग की याद ताजा करता है। राज्य में बार-बार संसाधनों की बात की जाती है, क्योंकि राज्य में जल, जंगल, जमीन, पर्यटन, तीर्थाटन आदि राज्य के विकास में मील का पत्थर साबित हो सकते है। लेकिन इन संसाधनों का उपयोग किस प्रकार राज्य के विकास में किया जायेगा, इसके लिए सरकार के पास न तो कोई नीति है और न ही कोई विजन।

इसका उदाहरण यह है कि प्रमुख नदियों के किनारे बसे शहर व गांवों के लिए कोई ऐसी योजना नहीं बनाई गई जिससे इन लोगों को पीने का पानी उपलब्ध कराया जा सके।
उत्तराखण्ड राज्य की सीमायें एक ओर तिब्बत (चीन), पाकिस्तान तथा दूसरी ओर नेपाल से लगी होने के कारण सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। अतः राज्य का सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक रुप से विकसित होना राज्य के लिए ही नही वरन् पूरे राष्ट्र के लिए आवश्यक है।

यह सर्वविदित है कि उत्तराखण्ड को छोड़कर सभी हिमालयी राज्य अराजकता एवं आतंकवादी घटनाओं का केन्द्र लम्बे समय से बने रहे है जिसका प्रमुख कारण कहीं न कहीं भेदभावपूर्ण नीतियां एवं आर्थिक पिछड़ापन है। लेकिन राज्य की बिडम्बना यह है कि राज्य प्राप्ति के बाद भी छोटी-मोटी नौकरी के लिए युवा पलायन के लिए मजबूर है। राज्य की अधिकतर जनसंख्या गांवों में निवास करती है जिनकों केन्द्र में रखकर विकास योजनाओं का खाका तैयार किया जाना चाहिए, जिससे गांवों के विकास के साथ-साथ बेरोजगारी एवं पलायन की समस्या को रोका जा सकता, परन्तु दुभाग्य ऐसा नही हो सका।

आज सरकार के पास मौका था जो लोग छोटी-मोटी नौकरियों के लिए भी पलायन कर गये थे वह कोविड-19 के कारण वापस अपने-अपने गांवों को लौट आये हैं। जिनके लिए राज्य में रोजगार के साधन उपलब्ध कराये जाते तो पलायन की आधी समस्या का समाधान स्वयं हो जाता। पलायन कर रहे लोगों की मजबूरी है यदि उन्हें घर गांव के पास ही रोजगार मिल जाता तो कोई व्यक्ति घर छोड़कर प्रदेशों में धक्के नही खाते। अतः आज ऐसी योजनाओं की आवश्यकता है जिससे हम वापस लौटे लोगों को यही रोक सकें और पलायन जैसे मुद्दे का समाधान करने की ओर एक कदम बढा सकते, जिससे राज्य निर्माण का सपना पूरा करने में सरकार एक कदम आगे बढ़ती।

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