हिमालय क्षेत्र के जंगलों के रख-रखाव का जिम्मा व आग बुझाने के संसाधन गांवों को दिए जांयः विजय जड़धारी

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हिमालय क्षेत्र के जंगलों के रख-रखाव का जिम्मा व आग बुझाने के संसाधन गांवों को दिए जांयः विजय जड़धारी

विश्व विख्यात चिपको आंदोलन की धरती है उत्तराखण्ड

आग बुझाने में गांववासी पूर्व की भांति सहयोग क्यों नहीं करते? यह चिन्ता नहीं अपितु शोध का विषय है 

चम्बा, टिहरी। हिमालय क्षेत्र के जंगलों में हो रही वनाग्नि की घटनाओं को रोकने के लिए आग लगाने वालों के खिलाफ कठोर कार्यवाही के मुख्यमंत्री के निर्णय की बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी ने प्रशंसा करते हुए सूबे के मुख्यमंत्री से मांग की है कि हिमालय क्षेत्र के जंगलों के रख-रखाव का जिम्मा व आग बुझाने के संसाधन गांवों को दिए जांय। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड विश्व विख्यात चिपको आंदोलन की धरती है और चिपको आंदोलनकारी के नाते हमारा जंगल से जुड़ा लम्बा अनुभव है। चिपको आंदोलन के एक नारा दिया था- ‘आज हिमालय की ललकार, वन पर गांवों का अधिकार।’

श्री जड़धारी ने कहा कि चिपको आंदोलन के पश्चात उत्तराखण्ड अकेला राज्य है, जिसके वनों का क्षेत्र खूब बढ़ा और समुदायों ने भी सामुदायिक जंगल बढ़ाकर हरियाली बढ़ाने का काम किया। फलतः आज हिमालय और हिमालय के जंगल पूरी दुनिया के लिए शुद्ध हवा का भण्डार है। उत्तरी भारत के लिए यहां की नदियां पेयजल की बड़ी श्रोत हैं। लेकिन बदले में यहां के जनमानस को कुछ नहीं मिलता और यही वजह है कि जंगलों के प्रति स्थानीय जनमानस का मोहभंग हो रहा है।

प्रदेश मुखिया को प्रेषित पत्र में श्री जड़धारी ने कहा कि जंगलों में आग क्यों लगती है और आग बुझाने में गांववासी पूर्व की भांति सहयोग क्यों नहीं करते? यह चिन्ता नहीं अपितु शोध का विषय है। कहा कि आग अपने आप नहीं लगती बल्कि लगायी जाती है।वह आड़े, कंटीली झाड़ी जलाने या अन्य कारणों से ग्रामीणों की लापरवाही अथवा वन विभाग के विफल वनीकरणों या उनकी लापरवाही से लगती है। जिससे भारी जैव विविधता के नुकसान के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ता है।

उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग करते हुए कहा कि समुदाय द्वारा संरक्षित जंगलों के बदले स्थानीय गांववासियों एवं अन्य संरक्षण करने वाली वन पंचायतों को ग्रीन बोनस के तौर पर आर्थिक मदद दी जानी चाहिए। जिससे उनकी आजीविका बढ़ाने के लिए रोजगार सृजन हो सके। केन्द्र सरकार को अर्न्तराष्ट्रीय संस्थाओं से यह मदद दिलानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि जंगल की आग सिर्फ और सिर्फ गांव वाले ही बुझा सकते हैं। क्योंकि उन्हें बाटे घाटों का पूरा ज्ञान होता है। जंगलों के प्रति उनका लगाव बढ़ाने, रोजगार व आजीविका से जोड़ने के लिए उन्हें जंगलों की पूरी जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए। वन विभाग को केवल सक्रिय सहयोगी बनाकर आग बुझाने, वन संरक्षण के पर्याप्त संसाधन गांव वालों को दिए जाने चाहिए और वजट में हर वर्ष इसका प्रावधान होना चाहिए।

वन विभाग ने जंगलों के समीप क्रू स्टेशन स्थापित कर अच्छी शुरुआत की है, किन्तु वन वीट अनुसार स्थानीय लोगों की पर्याप्त भर्ती नहीं की जाती है और जिनकी भर्ती की जाती है उनके साथ अन्याय देखिये- तीन चार माह उन्हें काम का आश्वासन देकर 380 रुपए प्रतिदिन की बात होती है जवकि वे दिन-रात एक करके आग बुझाने का काम करते हैं। बाबजूद इसके भी माह में चार रविवार काट लिए जाते हैं। इतना कम मानदेय के बाबजूद भी समय पर भुगतान नहीं होता, ऐसे में जंगलों को कैसे बचाया जाएगा?

कहा कि आग लगाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए। साथ ही आग बुझाने में सहयोग न करने वाले गांवों व वनकर्मियों के खिलाफ भी दण्ड का प्रावधान होना चाहिए। हर गांव को अपने समीप के सिविल सोयम या आरक्षित जंगलों की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। खासकर वन पंचायतों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

जंगलों के प्रति समुदाय का अपनत्व व प्रेम तभी होता है जब वे जंगल में पेड़ पौधों को पाले पोसें। समुदाय पोषित जंगल आज भी वनाग्नि से बच रहे हैं उन्हें विशेष संसाधन दिए जाने चाहिए।

उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि चम्बा प्रखण्ड के जड़धारगांव के लोगों ने 8 वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल में बांज बुरांस के नष्ट हुए जंगल को पुनर्जीवित कर सघन जंगल तैयार किया है। पिछले 44 सालों से वन सुरक्षा समिति बनाकर अब वन पंचायत के मार्फत भी आग से अपने घर की तरह रखवाली कर इस जंगल को आग से बचा रहे हैं।

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