हिंसक पशुओं का अंत हो जाए!

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हिंसक पशुओं का अंत हो जाए! : कविता 

कवि:सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

विश्व में हिंसक पशुओं का अंत हो जाए
बाघ चीते गुलदार लकडबघ्घे खो जांए।
शिकारी दांत कुकर बिल्लों तक सीमित,
केवल रोटी दूध खाने पीने के रह जांए,
और शाकाहार जीवों का स्वभाव बन जाए।

निगलने वाले जीव धरती से लुप्त हों जांए
कुदरती कहर झंझावात सृष्टि से मिट जाए।
सागर का जल पीने लायक मीठा बन जाए
खारे पानी के बीच सागरीय आग बुझ जाए,
और विशाल भीमकाय जहरीले सर्प खो जांए।

संसार फूल- पत्तों तरु- तृण से भर जाए
पहाड़ बर्फ बुग्याल वनाच्छादित हो जांए।
रेगिस्तान हरित मरूद्यान में बदल जांए
सकल संसार गोकुल वृंदावन बन जाए,
और कृष्ण मुरलीधुन मन में समा जाए।

खैर कुकाट कंटीले वृक्ष चंदन के बन जांए
बासमती की खुशबू से क्षेत्र भर जांए।
तैरती मछलियां उड़ती चिड़िया तितलियां,
क्षितिज पर इंद्रधनुष की आभा भर जाए,
और निशांत मन शांत हर्षित पुलकित हो जाए।

(कवि कुटीर)
सुमन कालोनी चंबा, टिहरी गढ़वाल।

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