सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से अप्रतिम, अद्भुत है दीपावली का हिन्दू महापर्व 

सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से अप्रतिम, अद्भुत है दीपावली का हिन्दू महापर्व 
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दीपोत्सव विशेष

भारत में मनाए जाने वाले सभी त्योहारों में दीपावली का विशेष महत्व है। यह त्योहार सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से अप्रतिम है, अद्भुत है। सामाजिक दृष्टिकोण से देखें – तो दीपावली आने से पूर्व हम सब अपने घरों की स्वच्छता पर ध्यान देते हैं अर्थात् पूर्ण स्वच्छता के साथ टूट-फूट का सुधार भी करते हैं, रक्षा और सुरक्षा। जिससे उस स्थान की आयु बढ़ती है और आकर्षण भी दो गुना हो जाता है। धार्मिक दृष्टिकोण से इस दिन धन सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवी मां महालक्ष्मी का आगमन होता है अतः उनका पूजन अर्चन आवश्यक है और विशिष्ट लोग ऐसा करते भी हैं।

सरहद का साक्षी @ आचार्य हर्षमणि बहुगुणा

शास्त्रानुसार जो व्यक्ति दीपावली के दिन जागरण कर महालक्ष्मी की पूजा अर्चना करता है उसके घर लक्ष्मी का वास होता है। अतः आलस्य और निद्रा का त्याग कर मां लक्ष्मी को अपने घर आहूत करना चाहिए। ब्रह्म पुराण के अनुसार कार्तिक मास की अमावस्या को अर्द्ध रात्रि के समय मां लक्ष्मी अच्छे गृहस्थों के यहां विचरण करती है, अतः अपने घर को हर प्रकार से स्वच्छ, शुद्ध और सुवासित कर दीपोत्सव मनाने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और वहां स्थाई रूप से निवास करती है, यह अमावस्या सायं काल (प्रदोषकाल) से अर्द्ध रात्रि तक रहने वाली श्रेष्ठ होती है।इस बार यह दीपोत्सव चार नवम्बर को है, उस दिन गुरुवार, स्वाती नक्षत्र, आयुष्मान योग महानिषीथ व्यापिनी प्रात: सूर्योदय से कुछ पूर्व से रात लगभग पौने तीन बजे तक है, अतः इस वर्ष की दीपमालिका विशेष रूप से अच्छी एवं पुण्य प्रदायक है।

दीपावली के लिए इस विशिष्ट लेख को एक दिन पूर्व (केवल दीपावली ही नहीं अपितु दीपावली के सभी त्योहारों को एक दिन पूर्व जन जागृति हेतु भेजने का प्रयास किया गया है, जिससे पर्व को मनाने में हम कुछ अच्छा विशेष कर सकेंगे।) भेजा जा रहा है।

दीपावली पञ्च पर्वों का महोत्सव है, धन तेरस से भैया दूज तक। (धन तेरस, नरक चतुर्दशी, दीपोत्सव, अन्नकूट गोवर्धन पूजा व यम द्वितीया भैया दूज) इसलिए इस दिन गणेश पूजा के साथ मां लक्ष्मी का पूजन षोडशोपचार से करना श्रेयस्कर है। यह सामान्य कृत्य है। जो आवश्यक भी है। विशेष रूप से आस्था वान व्यक्ति गोधूलि वेला में पंचांग पूजन व भगवती लक्ष्मी का यथा विधि षोडशोपचार पूजन निषीथ काल में करता है, साथ ही पितरों का पार्वण श्राद्ध दिन में करना चाहिए। लोकाचार का ध्यान रखना आवश्यक है। कुछ स्थानों पर दीवार, लकड़ी की पटरी पर या फर्श पर खड़िया, मिट्टी, या विभिन्न रंगों से रंगोली या विभिन्न चित्र बनाकर उनका पूजन अर्चन किया जाता है, कुछ लोग मां लक्ष्मी के चरण चिह्न बना कर मां का मार्ग प्रशस्त करते हैं। गणेश व लक्ष्मी की सोने या चांदी की मूर्ति या चांदी के सिक्कों का पूजन करते हैं।

थाली में तेरह या छब्बीस दीपक रख कर बीच में तैल का चतुर्मुखी दीपक रख कर दीपमालिका का पूजन करते हैं, पूजन के बाद दीपकों को घर के मुख्य- मुख्य स्थानों पर रखकर चतुर्मुखी दीपक रात भर जलता रहे ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए। इस दिन सामान्य तया श्री महाकाली पूजन (दवात) का, लेखनी पूजन, सरस्वती पूजन, कुबेर पूजन, तुला पूजन, दीपक पूजन (दीपमालिका का) करना चाहिए। यह एक सामान्य विधान है । यहां एक विशेष उल्लेख करना चाहूंगा कि मार्कण्डेय पुराण में वर्णित दुर्गा सप्तशती में चार रात्रियों का वर्णन किया गया है।

कालरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि व दारुणा। इनका अभिप्राय कालरात्रि नवरात्र की सप्तमी की रात्रि, महारात्रि – शिवरात्रि, मोहरात्रि – दीपावली की व दारुणा होली की रात को माना गया है। मत – मतान्तर अलग-अलग हो सकते हैं। यह भी सत्य है कि जिन देशों में जितने अधिक पर्व मनाए जाते हैं वे उतने ही उन्नत समझे जाते हैं। हमारे देश में प्रत्येक दिन पर्व व उत्सव का है, यही यहां की विशेषता भी है।” मां लक्ष्मी से यह प्रार्थना करनी आवश्यक है: –

अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने। धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे।।
पुत्रपौत्रधनं धान्यं हस्त्यश्वाश्वतरी रथम्। प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे।।

“भारतीय संस्कृति में दीपावली के महोत्सव की प्रतीक्षा महीनों पहले उत्सुकता पूर्वक की जाती है। इस रहस्य को सभी जानते हैं कि यह पर्व भगवान राम के अयोध्या लौटने के सुअवसर पर मनाया जाता हैं। चौदह वर्ष वन में रहकर रावण पर विजय प्राप्त कर जो मर्यादा पुरुषोत्तम अवध लौट रहे थे उनके आगमन की प्रसन्नता में दीपोत्सव मनाना फक्र का विषय था। महालक्ष्मी ने भक्त प्रह्लाद को बताया था कि वह तेज, बल, धर्म, सत्य,व्रत, शील मानवीय गुणों से भरपूर व्यक्तियों के पास निवास करती है अर्थात् शीलवान पुरुषों का वरण करती है। एक बार तो उन्होंने इन्द्र का भी परित्याग कर दिया था।

दीप महोत्सव की अनेकों कथाएं हैं पर यह ध्रुव सत्य है कि बुराई को मात देकर जो व्यक्ति अपने घर लौटता है उसका स्वागत दीप दान से ही किया जाता है और शरत्काल के परिपक्व अनाज से भण्डार पूर्ण होने के बाद नये शस्यों से विभिन्न प्रकार के पदार्थ बनाकर भगवान नारायण को समर्पित करना सबसे महत्वपूर्ण श्रेय है। यह कहानी भी महत्वपूर्ण है कि वामनावतारी भगवान विष्णु ने इस अमावस्या के दिन बलि को बांध कर सभी देवताओं को उसके कारागार से मुक्त करवाकर क्षीरसागर में जाकर शयन किया और सभी देवी-देवताओं ने इस अमावस्या के दिन लक्ष्मी नारायण का पूजन किया तो इस परम्परा को बनाए रखने के लिए भी दीपावली का यह पर्व अविस्मरणीय है जिससे लक्ष्मी माता हमारे घरों में भी स्थाई निवास करने के लिए पधारें। इतना ही नहीं तान्त्रिक विधान के लिए भी दीपावली की यह रात्रि विशेष महत्व रखती है, भले ही ऐसा करना करवाना दोनों हित कर नहीं है। ऐसा करने वाले तथा करवाने वालों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं होती है, क्षणिक लाभ के लिए ऐसे जघन्य पाप आने वाली पीढ़ी के लिए घातक होते हैं। हां मंत्र सिद्धि के लिए यह मोह रात्रि अनूठी है।पर मन्त्र भी परोपकार के लिए होने चाहिए, विक्रय के लिए नहीं!तो आइए दीपावली के इस पर्व पर कुछ समर्पण हेतु कर्म किया जाय, केवल वाणी से नहीं अपितु मन से कुछ परोपकार किया जाय , तो आने वाले भविष्य को संवारने के लिए इससे बढ़ कर कुछ नहीं है।

अमावस्या की अंधकारमय रात्रि से अंधेरे को दूर भगाने का सद्प्रयास है- ‘दीपावली’।

आशा है कि हम अपने अन्दर भरे हुए कूड़े करकट को साफ कर निर्मल व निर्विकार बन कर हरेक की प्रसन्नता का कारक बन सकेंगे। छल कपट से दूर मन के अन्धकार को मिटाने में समर्थ हो सकेंगे। मन की मिठास की मिठाई बांटी जाय तो एक सुयश होगा। अपनत्व की मिठास की भावना सर्वोपरि है, अन्यथा पशु प्रवृत्ति का साकार रूप है मानव।

 मंगल मय भविष्य की शुभकामनाओं के साथ आप सब को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई!